जन्माष्टमी: दो कैलेंडर, एक आधी रात
जन्माष्टमी कई वर्षों में दो तारीखों पर दिखती है, क्योंकि स्मार्त और वैष्णव संप्रदाय अलग नियमों से दिन चुनते हैं; 2027 दोनों का एक ही दिन है, 25 अगस्त, बुधवार। नियम, जन्म-कथा, आधी रात की पूजा, पारणा, क्षेत्रीय रीतें और व्रत का ईमानदार नोट, स्रोत-सहित।
आधी रात का पर्व है यह। दिनभर व्रत, भजन और जागरण, और फिर ठीक आधी रात को, जिस घड़ी परंपरा कृष्ण का जन्म मानती है, बालक के रूप में प्रतिमा स्नान कराकर पालने में रखी जाती है और व्रत खुलता है। पर यही पर्व कैलेंडर में कई वर्ष दो तारीखों पर छपता है, और उसकी वजह कोई छपाई की भूल नहीं, दो संप्रदायों के अलग-अलग प्राचीन नियम हैं। यह लेख जन्माष्टमी की पूरी बनावट खोलता है: नाम और तिथि, दो कैलेंडरों की गणना, जन्म-कथा, आधी रात की पूजा और पारणा, इलाके-दर-इलाके की रीतें, और 2027 की तारीख व समय।
नीचे की हर बात 31 अक्टूबर 2026 को लिए गए स्रोतों से आई है: द्रिकपंचांग का जन्माष्टमी 2027 का नई दिल्ली पृष्ठ (स्मार्त), उसी साइट का इस्कॉन जन्माष्टमी 2027 का नई दिल्ली पृष्ठ, और विकिपीडिया का कृष्ण जन्माष्टमी लेख। जहाँ कोई ग्रंथ इनके माध्यम से उल्लिखित है, जैसे धर्मसिंधु या निर्णयसिंधु, वह अप्रत्यक्ष उद्धरण है और अंकित किया गया है; हमने वे ग्रंथ स्वयं नहीं खोले। जहाँ द्रिकपंचांग अपनी संपादकीय राय देता है, वह उसी की राय के रूप में दर्ज है। सभी तारीखें और समय नई दिल्ली के हैं; पंचांग शहर के साथ बदलता है।
नाम में छिपी तारीख
जन्माष्टमी दो शब्दों से बना है: जन्म और अष्टमी। विकिपीडिया के अनुसार यह कृष्ण के जन्म का उत्सव है, जो भाद्रपद महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, पूर्णिमांत पद्धति में भाद्रपद और आमांत पद्धति में श्रावण; दोनों पद्धतियाँ उसी एक चांद्र दिन को दो महीनों के नाम देती हैं, इसलिए दिन एक ही रहता है। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह अगस्त या सितंबर में पड़ता है। पर्व के कई नाम चलते हैं और द्रिकपंचांग व विकिपीडिया दोनों उन्हें दर्ज करते हैं: कृष्णाष्टमी, गोकुलाष्टमी, अष्टमी रोहिणी, श्रीकृष्ण जयंती और श्री जयंती। कश्मीर में यह ज़राम सतम, यानी जन्म सप्तमी कहलाता है, जो कश्मीरी पंडितों की अपनी तिथि-गिनती दर्शाता है। द्रिकपंचांग 2027 के पृष्ठ पर इस वर्ष को कृष्ण की 5254वीं जन्म-वर्षगांठ लिखता है; यह उस पृष्ठ की गिनती है, हम उसे उसी के नाम से देते हैं।
अष्टमी कृष्ण पक्ष की है, यानी पूर्णिमा के बाद घटते चाँद की आठवीं तिथि। इसलिए जन्माष्टमी की रात का चाँद पूरा नहीं होता; परंपरा में उस रात का महत्व चाँद के दर्शन का नहीं, समय का है, निशिता काल का, वैदिक समय-गणना में आधी रात का कालखंड।
दो कैलेंडर: स्मार्त और वैष्णव
अधिकांतर वर्षों में जन्माष्टमी दो क्रमागत दिनों पर सूचीबद्ध होती है। द्रिकपंचांग बताता है कि पहली तारीख स्मार्त संप्रदाय की होती है और बाद वाली वैष्णव संप्रदाय की; जहाँ एक ही तारीख छपी है वहाँ दोनों एक ही दिन मनाते हैं। दोनों के नियम अलग हैं। वैष्णव नियम अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र को प्राथमिकता देते हैं, सप्तमी तिथि को कभी स्वीकार नहीं करते, और वैष्णव जन्माष्टमी हमेशा अष्टमी या नवमी तिथि पर पड़ती है। स्मार्त नियम अधिक पेचीदा हैं: प्राथमिकता निशिता काल को है, और दिन वह चुना जाता है जिसमें सप्तमी या अष्टमी में से जिस तिथि का विस्तार निशिता पर हो, फिर रोहिणी नक्षत्र के मेल को जोड़ा जाता है; स्मार्त जन्माष्टमी सप्तमी या अष्टमी पर पड़ती है। द्रिकपंचांग लिखता है कि धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु जैसे ग्रंथों में ये नियम स्पष्ट रूप से परिभाषित हैं; यह अप्रत्यक्ष उद्धरण है, हमने वे ग्रंथ स्वयं नहीं देखे।
यह अमूर्त बात नहीं है। द्रिकपंचांग की नई दिल्ली सूचियाँ ही इसे दिखाती हैं: 2025 में स्मार्त जन्माष्टमी 15 अगस्त शुक्रवार और इस्कॉन की 16 अगस्त शनिवार; 2031 में 9 और 10 अगस्त; 2034 में 5 और 6 सितंबर। वहीं 2024, 2026, 2027, 2028, 2029, 2030, 2032 और 2033 में दोनों सूचियाँ एक ही दिन देती हैं। 2027 ऐसा ही एक वर्ष है: 25 अगस्त, बुधवार, दोनों संप्रदायों के लिए एक ही दिन।
द्रिकपंचांग इस पृष्ठ पर एक संपादकीय टिप्पणी भी करता है जिसे हम उसी की टिप्पणी के रूप में दर्ज करते हैं: उसका कहना है कि उत्तर भारत में जो एकमत दिखता है वह इस्कॉन संस्था की पहुँच और प्रचार का परिणाम है, और कई लोग जो वैष्णव परंपरा के अनुयायी नहीं हैं भी इस्कॉन के दिन को ही जन्माष्टमी समझ बैठते हैं, जबकि उनके लिए उपयुक्त दिन शायद भिन्न हो। यह उस वेबसाइट का अपना मत है; हम इसे तथ्य के रूप में नहीं, स्रोत की राय के रूप में रखते हैं। व्यवहार की सीधी सीख यही है: अपने संप्रदाय या अपने मंदिर की परंपरा जान लें, और अपने शहर का पंचांग देख लें।
2027: तारीख और समय, नई दिल्ली
द्रिकपंचांग के नई दिल्ली पंचांग के अनुसार 2027 की गणना इस प्रकार है। जन्माष्टमी 25 अगस्त, बुधवार। अष्टमी तिथि 24 अगस्त को रात 8:24 से शुरू होकर 25 अगस्त को शाम 7:19 पर समाप्त होती है। रोहिणी नक्षत्र 25 अगस्त को दोपहर 12:27 से 26 अगस्त को सुबह 11:42 तक रहता है। निशिता पूजा का समय, वह कालखंड जिसमें मुख्य पूजा होती है, 26 अगस्त की रात 12:01 से 12:45 बजे तक, कुल 44 मिनट; आधी रात का क्षण 12:23 बजे है। चंद्रोदय 25 अगस्त को रात 11:41 पर होगा। दहि हांडी अगले दिन, 26 अगस्त गुरुवार को है।
पारणा की तीन गणनाएँ पृष्ठ पर दी गई हैं। धर्मशास्त्र के अनुसार पारणा 26 अगस्त को सुबह 11:42 के बाद, क्योंकि उस दिन अष्टमी सूर्योदय से पहले बीत जाती है और रोहिणी नक्षत्र 11:42 पर समाप्त होता है। एक वैकल्पिक शास्त्रीय पारणा उसी सुबह 5:56 के बाद, सूर्योदय के बाद देव-पूजा और विसर्जन के बाद भी मान्य है। और आधुनिक लोक-रीति के अनुसार कई जगह पारणा निशिता के तुरंत बाद, यानी 26 अगस्त की रात 12:45 के बाद कर दिया जाता है। ये समय नई दिल्ली के हैं; अन्य शहरों के लिए मिनटों का अंतर संभव है।
जन्म-कथा: कारागार से यमुना पार
विकिपीडिया के अनुसार कृष्ण के जीवन की जानकारी महाभारत, पुराणों और भागवत पुराण में मिलती है, और वह विष्णु के आठवें अवतार के रूप में जाने जाते हैं। कथा इस प्रकार है। कृष्ण देवकी और वसुदेव के आठवें पुत्र थे। देवकी के विवाह में एक आकाशवाणी ने कंस को चेताया कि देवकी का आठवाँ पुत्र उसकी मृत्यु का कारण बनेगा। कंस ने अपनी बहन और जीजा को कारागार में डाल दिया और उनके छह नवजातों की हत्या करवा दी। जिस रात कृष्ण का जन्म हुआ, पहरेदार सो गए और कक्ष के द्वार अपने आप खुल गए। वसुदेव नवजात को लेकर यमुना पार कर गोकुल पहुँचे, जहाँ कृष्ण का पालन-पोषण यशोदा और नंद ने किया। इसी कथा के स्मरण में लोग व्रत रखते हैं, प्रेम के भजन गाते हैं और रात जागते हैं। कृष्ण के बचपन में उनके सौतेले भाई बलराम निरंतर साथी रहे, और ब्रज की माखन-चोरी और बछड़ों के खेल की लीलाएँ इसी पर्व में गाई और निभाई जाती हैं।
रात की रीत: व्रत, पूजा, पारणा
द्रिकपंचांग व्रत की प्रक्रिया इस प्रकार देता है। जन्माष्टमी से एक दिन पहले केवल एक ही भोजन करें। व्रत के दिन सुबह की क्रियाओं के बाद संकल्प लिया जाता है कि दिन-भर का व्रत रखा जाएगा और अगले दिन पारणा किया जाएगा। पारणा तब, जब रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि दोनों बीत चुके हों; कुछ लोग दोनों में से एक बीतने पर भी पारणा करते हैं। व्रत में अन्न नहीं खाया जाता, और एकादशी के व्रत के सभी नियम इसमें भी लागू होते हैं। मुख्य पूजा निशिता काल में होती है, वैदिक समय-गणना की आधी रात में, और वह षोडशोपचार, सोलह चरणों की विधिवत पूजा होती है, बालकृष्ण की।
पारणा के नियम भी विस्तार से दिए गए हैं। पारणा अगले दिन सूर्योदय के बाद होना चाहिए जब अष्टमी और रोहिणी दोनों बीत चुके हों। यदि दोनों सूर्यास्त तक न बीतें, तो जब कोई एक बीत जाए। यदि दोनों सूर्यास्त तक, या यहाँ तक कि निशिता काल तक भी न बीतें, तो उनके बीतने तक प्रतीक्षा। इसी से वह दुर्लभ स्थिति बनती है जिसमें व्रत दो पूरे दिन चला जाए; द्रिकपंचांग धर्मसिंधु के हवाले से लिखता है कि जो दो दिन का व्रत न रख सकें, वे अगले दिन सूर्योदय के बाद पारणा कर सकते हैं, अप्रत्यक्ष उद्धरण। विकिपीडिया इस रात की घरेलू छवि जोड़ती है: आधी रात के बाद बालक कृष्ण की प्रतिमा स्नान कराकर वस्त्र पहनाकर पालने में रखी जाती है, और भक्त मिठाइयाँ बाँटकर व्रत खोलते हैं; घरों के द्वार और रसोई पर छोटे-छोटे चरणचिह्न बनाए जाते हैं, घर की ओर आते हुए, जैसे कृष्ण स्वयं घर में प्रवेश कर रहे हों।
व्रत पर एक ईमानदार नोट (यह अनुभाग हमारा है)
ऊपर जो लिखा है वह परंपरा का वर्णन है, हमारी सलाह नहीं। हमने स्रोतों से व्रत के नियम दर्ज किए हैं, पर कोई भी स्रोत स्वास्थ्य-संबंधी छूट नहीं देता, इसलिए यह नोट हम खुद लिख रहे हैं। दिन-भर अन्न रहित रहना, और कुछ परंपराओं में निर्जला रहना, हर शरीर पर एक जैसा नहीं पड़ता। गर्भवती, बीमार, बुजुर्ग, नियमित दवा पर रहने वाले, या जिन्हें डॉक्टर ने व्रत से मना किया हो, उनके लिए डॉक्टर की सलाह ही आधार है, कोई पर्व-पृष्ठ नहीं। कोई किसी से व्रत माँग नहीं सकता, न परिवार में, न किसी रिश्ते में। और जो व्रत रखते हैं, उन्हें हम किसी फल की गारंटी नहीं देते; कथाएँ श्रद्धा की भाषा बोलती हैं और हम उन्हें श्रद्धा के रूप में ही छापते हैं। जो चाहे, भजन, कथा, झांकी और साथ के भोजन से भी इस पर्व में पूरा सहभागी बन सकता है; परंपरा में उसके लिए भी जगह है।
इलाके-दर-इलाके: एक पर्व, कई रूप
विकिपीडिया के अनुसार जन्माष्टमी ब्रज का सबसे बड़ा पर्व है, मथुरा जहाँ कृष्णवाद में कृष्ण का जन्म माना जाता है, और वृंदावन जहाँ वे बढ़े। रासलीला, रस की लीला, यहाँ नृत्य-नाटिका के रूप में कई दिन पहले से शुरू हो जाती है, और पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी की ब्रजभाषा कविता, विशेष रूप से सूरदास का सूरसागर, इस मौसम में पुनः गाई जाती है। विद्वान क्रिश्चियन रॉय आदि के अनुसार राधा-कृष्ण की प्रेम-कथाएँ मनुष्य-आत्मा की परमात्मा से लगाव का प्रतीक मानी गई हैं; यह विद्वानों की व्याख्या है। जम्मू क्षेत्र में पर्व ठोगरे या ठाकुरे दा व्रत कहलाता है; फलाहारी व्रत, सड़कों पर फलाहारी धाम और भंडारे, और इसी दिन से पतंग-उड़ाने का मौसम शुरू होता है; महिलाएँ हथेलियों पर टीरा लगाती हैं, देया परना में पूर्वजों के नाम अन्न दान होता है, जांड वृक्ष की पूजा और द्रौपद नाम की रोटियाँ गायों और देवताओं को चढ़ती हैं। कश्मीर में कश्मीरी पंडित इसे ज़राम सतम मनाते हैं: दिनभर व्रत, आधी रात को ठोकुर कुठ, कृष्ण मंदिर, में अभिषेक और भजन, और व्रत-अनुकूल भोजन जैसे गएर या सिंघाड़े की लप्सी।
महाराष्ट्र में पर्व दहि हांडी के नाम से जाना जाता है, मुंबई, लातूर, नागपुर और पुणे में। ऊँचाई पर लटकाए गए दही-छाछ के मटके को तोड़ने के लिए युवा मंडलियाँ मानव-पिरामिद बनाती हैं; बिखरी सामग्री प्रसाद मानी जाती है, और विकिपीडिया इसे सामाजिक एकता का उत्सव कहती है। यह माखन-चोर कृष्ण की बाल-लीला का जीवंत अभिनय है। गुजरात में द्वारका में माखन हांडी मनती है, गरबा और रास होते हैं, कच्छ में किसान सजे बैलगाड़ियों की प्रक्रिया निकालते हैं, और पुष्टिमार्ग व स्वामिनारायण परंपराओं के लिए दिन विशेष है; नरसिंह मेहता, दयाराम और मीराबाई के भजन इस मौसम में लौटते हैं। केरल में जन्माष्टमी मलयालम कैलेंडर के अनुसार सितंबर में मनाई जाती है। तमिलनाडु में घरों में कोलम बनते हैं, गीत गोविंदम गाया जाता है, देहलीज से पूजा-कक्ष तक बालक के चरणचिह्न बनाए जाते हैं, और सीडई व वेरकडलै उरुंडई जैसे व्यंजन चढ़ते हैं; अधिकांश लोग कठोर उपवास रखते हैं और उत्सव शाम को मनता है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में श्लोक-पाठ और भजन विशेष हैं, और छोटे लड़के कृष्ण के वेश में पड़ोस में घूमते हैं; चकोडी, मुरुक्कु और सीडई चढ़ते हैं।
ओडिशा और पश्चिम बंगाल में, पुरी और नबद्वीप के आसपास, पर्व श्रीकृष्ण जयंती या श्री जयंती कहलाता है। भागवत पुराण का दसवाँ स्कंध पढ़ा जाता है, रात 12 बजे भव्य अभिषेक होता है, अगले दिन नंद उत्सव मनता है, और पुरी के जगन्नाथ मंदिर में जन्माष्टमी पर एक रथयात्रा भी निकलती है। पूर्वोत्तर में पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी के शंकरदेव और चैतन्य महाप्रभु की शिक्षाओं का प्रभाव है: शंकरदेव की बोरगीत, अंकिया नाट और सत्त्रिया परंपराएँ असम और बंगाल में, और मणिपुर में मणिपुरी नृत्य-शैली की रासलीला इस पर्व की पहचान है; मणिपुर के मेइतेई कृष्णवादी समुदाय में बच्चे लिकोल सन्नाबा खेल खेलते हैं, और असम में नामघरों में नाम गायन और पूजा होती है। भारत से बाहर, नेपाल में जन्माष्टमी राष्ट्रीय अवकाश है और अधिकांश लोग आधी रात तक व्रत रखते हैं; बांग्लादेश में भी राष्ट्रीय अवकाश है, और ढाका के ढाकेश्वरी मंदिर से निकलने वाली प्रक्रिया 1902 से चलती है, 1948 में रुकी और 1989 में फिर शुरू हुई; फिजी में कृष्ण अष्टमी आठ दिन चलती है, मंडलियाँ रात-रात भागवत पुराण पढ़ती हैं; और पाकिस्तान में कराची के स्वामिनारायण मंदिर में भजन और प्रवचन होते हैं, यह वैकल्पिक अवकाश है।
अगला दिन: नंदोत्सव और दहि हांडी
जन्म का उत्सव अगले दिन तक बढ़ता है। उत्तर भारत में अगले दिन नंदोत्सव मनाया जाता है, नंद और यशोदा के घर की खुशी; ओडिशा-बंगाल में इसे नंद उच्छब कहते हैं। महाराष्ट्र और अब कई अन्य शहरों में अगला दिन दहि हांडी का है; द्रिकपंचांग 2027 के लिए इसे 26 अगस्त, गुरुवार लिखता है। इस प्रकार पर्व की संरचना स्पष्ट है: एक रात जन्म की, और एक दिन उस जन्म की खुशी का, जिसमें माखन-चोर की लीला सड़कों पर उतर आती है।
सार
जन्माष्टमी समझने के लिए तीन बातें काफी हैं। नाम में ही तारीख है, जन्म और अष्टमी, भाद्रपद या श्रावण की कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि। दिन चुनने के दो नियम हैं, स्मार्त और वैष्णव, और इसीलिए कुछ वर्षों में दो तारीखें छपती हैं; 2027 में दोनों एक हैं, 25 अगस्त। और पर्व का केंद्र आधी रात है, निशिता काल, जब कथा के अनुसार कारागार के द्वार खुले थे और यमुना पार हुई थी। 2027 के लिए नई दिल्ली में निशिता पूजा 12:01 से 12:45 बजे रात है; अपने शहर का पंचांग देख लें, और व्रत रखना हो या न हो, रात के भजन और कथा में शामिल होना पर्व का पूरा हिस्सा है।
इस लेख के सवाल
2027 में कृष्ण जन्माष्टमी कब है?
द्रिकपंचांग के नई दिल्ली पंचांग के अनुसार 25 अगस्त 2027, बुधवार। निशिता पूजा का समय 26 अगस्त की रात 12:01 से 12:45 बजे तक है, और इस वर्ष स्मार्त और वैष्णव (इस्कॉन) दोनों संप्रदाय एक ही दिन मनाते हैं। दहि हांडी 26 अगस्त, गुरुवार को है। तिथि-सीमा शहर के साथ बदलती है, इसलिए अपने शहर का पंचांग देख लें।
जन्माष्टमी की दो तारीखें क्यों दिखती हैं?
क्योंकि स्मार्त और वैष्णव संप्रदाय दिन चुनने के अलग नियम रखते हैं। द्रिकपंचांग के अनुसार स्मार्त नियम निशिता काल को प्राथमिकता देते हैं और दिन सप्तमी या अष्टमी तिथि पर पड़ सकता है; वैष्णव नियम सप्तमी को कभी नहीं लेते, दिन अष्टमी या नवमी पर पड़ता है और रोहिणी नक्षत्र को भारी महत्व मिलता है। जब दोनों गणनाएँ अलग दिन देती हैं तो कैलेंडर में दो तारीखें छपती हैं, जैसे 2025, 2031 और 2034 में; 2027 में गणना एक ही दिन देती है।
जन्माष्टमी के व्रत का पारणा कब होता है?
परंपरागत नियम के अनुसार पारणा अगले दिन सूर्योदय के बाद होता है, जब अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र दोनों बीत चुके हों; यदि दोनों सूर्यास्त तक न बीतें तो जिस दिन कोई एक बीत जाए; और कई जगह पारणा निशिता, यानी आधी रात के तुरंत बाद भी करते हैं। द्रिकपंचांग धर्मसिंधु के हवाले से लिखता है कि तिथि और नक्षत्र देर तक बने रहने पर व्रत दो पूरे दिन भी चल सकता है, और जो न रख सकें वे अगले दिन सूर्योदय के बाद पारणा कर सकते हैं, अप्रत्यक्ष उद्धरण। 2027 में, नई दिल्ली: शास्त्रीय पारणा 26 अगस्त को सुबह 11:42 के बाद, वैकल्पिक सूर्योदय-पारणा 5:56 के बाद, आधुनिक रीत से रात 12:45 के बाद।
क्या जन्माष्टमी पर व्रत रखना आवश्यक है?
यह लेख व्रत का वर्णन करता है, विधान नहीं। परंपरा में दिन-भर का उपवास है, अन्न का त्याग और आधी रात के बाद या अगली सुबह पारणा; पर गर्भवती, बीमार, बुजुर्ग या नियमित दवा पर रहने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए डॉक्टर की सलाह ही आधार है, कोई पर्व-पृष्ठ नहीं। कोई किसी से व्रत माँग नहीं सकता। भजन, कथा, झांकी और साथ के भोजन से भी पर्व में सहभागिता पूरी है; परंपरा में उसके लिए भी जगह है।