· पुष्य नक्षत्र
पंचांग

करण: तिथि का आधा, साठ हिस्से और ग्यारह नाम

तिथि का आधा करण: साठ हिस्से, ग्यारह नाम, चार अमावस्या के द्वार पर और सात आठ चक्र घूमते; गणना, भद्रा-परंपरा, पशु-नाम और 500 ईसा-पूर्व की जड़ें।

साठ खानों की पट्टी; पहला और अंतिम तीन खाने टेराकोटा में; बीच के खानों पर 1 से 7 का क्रम और गुणा-8 चिह्न
चांद्र-मास के साठ करण-हिस्से: पहला हिस्सा किंस्तुघ्न और अंतिम तीन शकुनि, चतुष्पाद, नाग, ये चार स्थिर नाम टेराकोटा में; बीच के 56 हिस्सों पर सात चर नामों का क्रम आठ बार घूमता है

पंचांग का पांचवां अंग करण सबसे सीधा अंग है और साथ ही सबसे अजीब नामकरण वाला। सीधा इसलिए: यह तिथि का ठीक आधा है, और तिथि जानने वाले के लिए इसका माप एक पंक्ति में समझ आ जाता है। अजीब इसलिए: चांद्र-मास के साठ करण-हिस्से होते हैं, पर नाम केवल ग्यारह हैं। विकिपीडिया के Karaṇa (pañcāṅga) पृष्ठ की परिभाषा: करण तिथि का आधा है, वह अवधि जिसमें सूर्य और चंद्रमा के देशांतरों का अंतर 6 अंश बढ़ जाता है; एक चांद्र-मास में 30 तिथियां और इसलिए 60 करण होते हैं, और ये साठ करण अलग-अलग नामित नहीं हैं, संकल्पना के रचयिताओं ने ग्यारह नाम चुने जो करणों से जुड़े, यानी कई करण एक ही नाम साझा करते हैं। यह लेख इसी व्यवस्था की पड़ताल है: माप, नामों का नक्शा, कौन-सा करण चल रहा है यह निकालने की स्रोत-विधि और एक कार्यित उदाहरण, भद्रा से बचने की परंपरा और उस पर स्रोतों का मतभेद, मलयालम परंपरा के पशु-नाम, और करण-संकल्पना की उत्पत्ति का पुराना इतिहास।

माप: तिथि का आधा, छह अंश

तिथि चंद्रमा और सूर्य के देशांतर-अंतर के 12 अंश की इकाई है; करण उसी अंतर के 6 अंश की इकाई है। हर तिथि में दो करण, पहला हिस्सा और दूसरा हिस्सा; हर पक्ष में पंद्रह तिथियां यानी तीस करण, और पूरे मास में साठ। shastrapanchangam अपनी करण-विधि पृष्ठ पर एक सूक्ष्म परंतु केंद्रीय चेतावनी देता है: आधी तिथि का अर्थ आधा कोणीय अंतराल है, ज़रूरी नहीं कि घंटों में आधी अवधि, क्योंकि चंद्रमा की गति बदलती रहती है; इसीलिए करण के समाप्ति-समय हर छह-अंश की सीमा पर अलग से गिने जाते हैं। दैनिक पंचांग-पृष्ठ पर करण का नाम उसके समाप्ति-समय के साथ छपता है, और shastrapanchangam बताता है कि दैनिक पृष्ठ सूर्योदय पर मौजूद करण और उसका समाप्ति-समय दिखाता है। पढ़ने की आदत तिथि वाली ही: नाम हालत बताता है, समय सीमा।

पंचांग की कोण-इकाइयों की सीढ़ी पर देखिए तो करण ठीक बीच में बैठता है: नक्षत्र और योग 13 अंश 20 कला के खंड हैं, तिथि 12 अंश की, करण 6 अंश का, और नक्षत्र-पद 3 अंश 20 कला का। यानी एक नक्षत्र-खंड में दो तिथि से थोड़ा अधिक का फासला है, एक तिथि में दो करण, और एक करण में लगभग दो पद; यह सीढ़ी समझ लेने से पंचांग के पांचों अंगों की इकाइयां एक-दूसरे में उतरती दिखती हैं, और करण तिथि और पद के बीच की कड़ी है।

साठ हिस्से, ग्यारह नाम

अब नामकरण का नक्शा, जैसा विकिपीडिया देती है। ग्यारह नाम दो वर्गों में बंटे हैं। पहला वर्ग: चार स्थिर नाम, जो मास में एक-एक ही हिस्से से जुड़े हैं, किंस्तुघ्न शुक्ल प्रतिपदा के पहले हिस्से का, शकुनि कृष्ण चतुर्दशी के दूसरे हिस्से का, चतुष्पाद अमावस्या के पहले हिस्से का, और नाग अमावस्या के दूसरे हिस्से का। दूसरा वर्ग: सात चर नाम, बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि, जो शुक्ल प्रतिपदा के दूसरे हिस्से से लेकर कृष्ण चतुर्दशी के पहले हिस्से तक के 56 हिस्सों पर उसी क्रम में घूमते हैं, क्रम आठ बार दोहराया जाता है, इसलिए हर चर नाम मास में आठ अलग-अलग हिस्सों से जुड़ता है। स्थिर चारों की जगह देखिए: तीन मास के अंत में, अमावस्या और उससे ठीक पहले, और एक मास की शुरुआत में ठीक अमावस्या के बाद; shastrapanchangam इन्हें संक्षेप में अमावस्या के निकट कहता है। यानी नाम सुनते ही मास में स्थिति पता चल जाती है: किंस्तुघ्न सुना तो नया चांद्र-मास शुरू हुआ, शकुनि, चतुष्पाद या नाग सुना तो मास समाप्ति पर है, और बाकी सात नाम बीच के 56 हिस्सों का घूमता पहिया हैं।

पहला चक्र धीरे-धीरे चलकर देखिए, तालिका विकिपीडिया की बनावट-तालिका से है: शुक्ल प्रतिपदा का दूसरा हिस्सा बव, द्वितीया का पहला हिस्सा बालव, दूसरा हिस्सा कौलव, तृतीया का पहला हिस्सा तैतिल, दूसरा हिस्सा गर, चतुर्थी का पहला हिस्सा वणिज, दूसरा हिस्सा विष्टि; और यहीं सात पूरे होते हैं, इसलिए पंचमी का पहला हिस्सा फिर बव, और चक्र नए सिरे से घूमने लगता है। हर तिथि के दो हिस्से क्रम में अगले-अगले नाम लेते हैं, इसलिए नामों की चाल पूरी तरह नियत है: किसी हिस्से का नाम जानने के लिए किसी तालिका की ज़रूरत नहीं, केवल मास में उस हिस्से की क्रम-संख्या और सात का भाग चाहिए। आठवां चक्र कृष्ण चतुर्दशी के पहले हिस्से पर विष्टि के साथ समाप्त होता है, और उसके ठीक बाद स्थिर नामों का द्वार शुरू होता है: चतुर्दशी का दूसरा हिस्सा शकुनि, अमावस्या का पहला चतुष्पाद, दूसरा नाग, और नए मास की प्रतिपदा का पहला हिस्सा किंस्तुघ्न। गिनती सुई लगाकर देखिए: 56 हिस्से सात नामों के आठ चक्र, जमा चार स्थिर, कुल साठ; संकल्पना के रचयिताओं ने ग्यारह ही नाम क्यों चुने, इसका कारण हमारे परामर्शित पृष्ठ नहीं बताते; जो दर्ज है वह यह गणितीय सामंजस्य है, और यह कि साठ हिस्सों को अलग-अलग नाम देने के बजाय ग्यारह नामों की व्यवस्था चुनी गई।

साठ छोटे खानों की पट्टी; पहला खाना और अंतिम तीन खाने टेराकोटा छाया में; बीच के खानों पर 1 से 7 संख्याओं का दोहराता क्रम और गुणा-8 का चिह्न
चांद्र-मास के साठ करण-हिस्से: पहला हिस्सा किंस्तुघ्न और अंतिम तीन शकुनि, चतुष्पाद, नाग, ये चार स्थिर नाम टेराकोटा में; बीच के 56 हिस्सों पर सात चर नामों का क्रम आठ बार घूमता है।

कौन-सा करण अभी: स्रोत की विधि, हमारी गणना

विकिपीडिया करण निकालने की विधि भी देती है, जो दो रूपों में लिखी है। सरल रूप: सूर्य और चंद्रमा के देशांतर S और M लीजिए; अंतर D निकालिए, यदि M छोटा हो तो 360 जोड़कर; D को 6 अंश से भाग दीजिए, भागफल K पूर्णांक; यदि K शून्य, 57, 58 या 59 है तो करण क्रमशः किंस्तुघ्न, शकुनि, चतुष्पाद या नाग; अन्यथा K से 7 का निकटतम गुणज घटाकर N निकालिए, और सात चर नामों की सूची में N नंबर का नाम करण है। गणितीय रूप: K बराबर 60 गुणा अंतर-भिन्न का पूर्णांक-भाग, और K को 60 और फिर 7 के शेषफल से नाम तक पहुंचिए; दोनों रूप एक ही नाम देते हैं। एक काल्पनिक क्षण पर चलाइए: मान लीजिए देशांतर-अंतर 200 अंश है। K बराबर 200 भाग 6, यानी 33; यह चार स्थिर संख्याओं में नहीं; 33 से 7 का गुणज 28 घटाने पर 5; सूची में पांचवां चर नाम गर; तो उस क्षण गर करण चल रहा है। गणितीय रूप से भी 33 का 7 पर शेषफल 5, और उसकी सूची में भी पांचवां स्थान गर का ही है। यह पूरा उदाहरण हमारी अपनी गणना है जो स्रोत की विधि को दोहराती है; किसी पंचांग-पृष्ठ का उद्धृत क्षण नहीं।

इसी उदाहरण से एक जांच और चलाइए: 200 अंश किस तिथि के किस हिस्से में है? तिथि 12 अंश की, तो 200 भाग 16.67, यानी सत्रहवीं तिथि चल रही है; सत्रहवीं तिथि कृष्ण पक्ष की द्वितीया है, और 192 अंश, सोलह तिथियों की सीमा, से आगे 8 अंश चल चुके हैं, यानी छह अंश पार, तो द्वितीया का दूसरा हिस्सा। अब बनावट-तालिका की चाल से जांचिए: किंस्तुघ्न के बाद हिस्सा-क्रम दो से शुरू करते हुए, हर हिस्से को क्रम-संख्या दीजिए; दूसरे हिस्से से 33वां हिस्से-क्रम तक की गिनती में सात का चक्र लगाइए, और वही गर निकलता है। दोनों रास्ते, कोण-विधि और तालिका-चाल, एक ही नाम पर मिलते हैं; यह आपसी जांच किसी भी पंचांग-तालिका की सत्यता परखने का घरेलू तरीका है।

भद्रा से बचना, और अशुभ-पट्टी का मतभेद

करण का सबसे प्रसिद्ध नाम विष्टि है, जिसे भद्रा भी कहते हैं। shastrapanchangam लिखता है कि पारंपरिक मुहूर्त-चयन में इस अवधि को शुभ कार्यों की शुरुआत के लिए सामान्यतः टाला जाता है; kaalpanchang भी विष्टि को अशुभ कहता है और भद्रा नाम दर्ज करता है। यहां एक मतभेद दर्ज करना ज़रूरी है: kaalpanchang की सूची चार करणों को अशुभ कहती है, विष्टि के साथ तीन स्थिर नाम, शकुनि, चतुष्पाद और नाग भी, जबकि shastrapanchangam अपनी विधि-पृष्ठ पर केवल विष्टि-भद्रा के टालने का उल्लेख करता है, अन्य स्थिर नामों के लिए ऐसा नहीं कहता। दोनों पाठ यथास्थिति दर्ज हैं; बचने की सूची कितनी लंबी है, इस पर हमारे स्रोत एक नहीं बोलते। और पट्टी का दर्जा वही है जो योग-लेख में दर्ज हुआ: यह वर्गीकरण परंपरा का मूल्यांकन है, गणित का आउटपुट नहीं; छह-अंश की सीमा बनाने की गिनती को यह नहीं पता कि कौन-सा हिस्सा अशुभ है, और मुहूर्त-पद्धति में करण भी अन्य अंगों के साथ का एक कारक है, अकेला फैसला नहीं।

व्यावहारिक रूप से भद्रा से बचना समय-खिड़की का काम है, दिन-भर के बहिष्कार का नहीं। विष्टि एक चर करण है, मास में आठ बार आता है, और हर बार केवल अपने छह-अंश के हिस्से तक रहता है; shastrapanchangam के बताए अनुसार दैनिक पृष्ठ सूर्योदय पर चल रहे करण और उसका समाप्ति-समय दिखाता है, तो भद्रा चल रही हो तो उसका समाप्ति-समय देखकर बाकी दिन की योजना बनाई जा सकती है। यह पढ़ने का वही ढंग है जो तिथि और योग के लेखों में आया: पंचांग दिनों के बजाय सीमाओं और समयों की सूची है, और बचना भी एक समय-सीमा तक का बचना है।

नामों की दूसरी परत: मलयालम पशु-नाम

ग्यारह नामों की एक क्षेत्रीय परत भी दर्ज है। विकिपीडिया बताती है कि मलयालम खगोल-साहित्य में ग्यारह करणों को पशुओं के नाम दिए गए हैं, और पप्पूट्टी के ग्रंथ के हवाले से तालिका देती है: शकुनि शिखरा-बाज़, चतुष्पाद चौपाया, नाग सांप, किंस्तुघ्न कीड़ा, बव शेर, बालव बाघ, कौलव सूअर, तैतिल गधा, गर हाथी, वणिज गाय, और विष्टि कुत्ता। यह तालिका दो बातें दिखाती है। पहली: एक ही गणना-इकाई पर भाषा-भाषा की नाम-परतें चढ़ती हैं; संस्कृत-परंपरा के नाम अलग, मलयालम के पशु-नाम अलग, पर साठ हिस्सों का नक्शा वही। दूसरी: नाम याद रखने की तकनीक हैं; पशु-रूप उस परंपरा में पढ़ने वाले के लिए स्मरण-सहायक है, ठीक उसी तरह जैसे हमारे यहां नक्षत्र-प्रतीक हैं। इस परत को भी हम उसी दर्जे में रखते हैं जो पूरी नामकरण-परत का है: परंपरा की सूची, गणित नहीं।

एक पारदर्शिता की टिप्पणी: स्रोत-तालिका में हर पशु-नाम के साथ मलयालम लिपि का मूल शब्द भी छपा है; हमने यहां विकिपीडिया के दिए अंग्रेजी-अर्थ ही दोहराए हैं, मूल लिपि के शब्द उसी स्रोत-पृष्ठ पर देखे जा सकते हैं। और एक संगति देखिए: ग्यारह में से कुछ जोड़े पड़ोसी-पशुओं के हैं, शेर-बाघ, गधा-हाथी, गाय-कुत्ता; ऐसी जोड़ियां क्रम-स्मृति की पुरानी तकनीकों से मेल खाती हैं, जहां लगातार आने वाली वस्तुएं एक ही परिचित जोड़ी से बांधी जाती हैं ताकि क्रम याद रहे। यह संगति-टिप्पणी हमारी है, स्रोत केवल नामों की तालिका देता है।

कहां से आया: चांद्र-दिन का आधा

करण-संकल्पना की उत्पत्ति का विकिपीडिया पर दर्ज इतिहास हमारे योग-लेख के इतिहास से बिल्कुल उलट है, और यही तुलना इस क्लस्टर की सबसे शिक्षाप्रद बात है। योग पंचांग में सबसे देर से आया था, लगभग 700 ईस्वी; करण की जड़ें सबसे पुरानी परतों में हैं। पृष्ठ के अनुसार करण-संकल्पना संभवतः तिथि-संकल्पना के साथ-साथ उठी: आधुनिक तिथि से पहले चांद्र-दिन की अवधारणा प्रचलित थी, एक चंद्रोदय से अगले चंद्रोदय तक का समय; और जैसे सावन-दिन, एक सूर्योदय से अगला सूर्योदय, को सूर्योदय-से-सूर्यास्त और सूर्यास्त-से-सूर्योदय में दो भागों में बांटा जाता था, वैसे ही चांद्र-दिन भी दो हिस्सों में बंटता था, चंद्रोदय से चंद्रास्त और चंद्रास्त से चंद्रोदय। करण-संकल्पना इसी दो-भाग वाले विभाजन से जन्मी; बाद में जब तिथि की आधुनिक अवधारणा स्थापित हुई, तो चांद्र-दिन के वे दो हिस्से आधी-तिथि की कृत्रिम अवधारणा में बदल गए। प्रमाण-परत: पृष्ठ के अनुसार वेदांग-काल की रचनाएं, अथर्व ज्योतिष और ऋक्-परिशिष्ट, करणों का उल्लेख करती हैं, इसलिए संकल्पना की उत्पत्ति वेदांग ज्योतिष के काल, लगभग 500 ईसा-पूर्व, तक पहुंचाई जा सकती है; यह निष्कर्ष पृष्ठ के उद्धृत दीक्षित और शर्मा के अध्ययनों पर टिका है। यानी पंचांग के पांच अंगों में करण का दावा सबसे पुरानी परतों तक जाता है, जबकि योग का दावा सबसे नई परतों का; दोनों को एक ही उम्र मान लेना पंचांग-इतिहास की आम गलती है।

इस इतिहास से एक व्यावहारिक सीख भी निकलती है। करण की जड़ें उस दौर की हैं जब दिन-गिनती चंद्रोदय-चंद्रास्त जैसी दिखने वाली घटनाओं से चलती थी; आधुनिक करण उसी पुराने दो-भाग विभाजन की अंग-गणितीय संतान है, जो अब सूर्य-चंद्र देशांतर-अंतर की 6 अंश की सीमा है। यानी जो इकाई कभी आकाश देखकर नापी जाती थी, वही आज गणना से निकलती है; नाम वही, नापने का ढंग बदल गया। यह परत-बदलाव पंचांग के हर अंग की कहानी है, पर करण में वह सबसे साफ दिखता है, क्योंकि इसका नामकरण-नक्शा, चार स्थिर और सात चर, आज भी उसी पुराने दो-हिस्सों वाले ढांचे को मास की साठ सीमाओं पर चलाता है।

करण कैसे पढ़ें: तीन सवाल

पंचांग-पृष्ठ पर करण-सूचना पढ़ने की विधि तीन सवालों की है। पहला: कौन-सा करण चल रहा है और उसका समाप्ति-समय क्या है? समाप्ति-समय ही सीमा है, और यह हर छह-अंश की सीमा पर अलग से गिना जाता है; आधी तिथि घंटों में आधी हो, यह मान लेना गलती है, क्योंकि चंद्र-गति बदलती है। दूसरा: नाम सुनकर मास में स्थिति पहचानिए, चार स्थिर नाम अमावस्या के इर्द-गिर्द की घड़ी बताते हैं, और सात चर नाम बीच के 56 हिस्सों का घूमता क्रम; किंस्तुघ्न नई शुरुआत, शकुनि-चतुष्पाद-नाग समाप्ति के द्वार। तीसरा: आपका स्रोत बचने की सूची कितनी लंबी बताता है? एक स्रोत केवल विष्टि-भद्रा टालता है, दूसरा तीन स्थिर नाम भी अशुभ कहता है; दोनों पाठ ऊपर दर्ज हैं, और दोनों परंपरा के मूल्यांकन हैं, गणित के नहीं। इन तीनों के बाद ही मुहूर्त-विचार आता है, और वहां करण तिथि, वार, नक्षत्र और योग के साथ का एक कारक है।

सार में करण तिथि की आधी इकाई है, छह अंश की सीमा, साठ हिस्सों पर चढ़ी ग्यारह नामों की एक कुशल नामकरण-परत: चार नाम अमावस्या के द्वार पर ठहरे, सात नाम आठ चक्कर घूमते। इसकी गणना एक पंक्ति की है, इसका इतिहास वेदांग-काल तक जाता है, और इसकी अशुभ-पट्टी परंपरा की है; तीनों परतें अलग-अलग पहचानिए, और करण-पढ़ना साफ हो जाता है।

अमन राज · संस्थापक और संपादक

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