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त्योहार

करवा चौथ: एक घड़ा, एक छलनी, और चाँद का इंतज़ार

करवा चौथ तीन चीज़ों से समझ आता है: मिट्टी का करवा, छलनी और चाँद। उत्पत्ति, सरगी, फेरियाँ, कथाएँ, आज की बहस, व्रत का ईमानदार नोट और 2027 की तारीख, स्रोत-सहित।

एक पंक्ति में तीन चित्रित वस्तुएँ: मिट्टी का करवा घड़ा, गोल छलनी जिसमें छेद दिखते हैं, और पूर्णिमा के ठीक बाद का थोड़ा घटता चाँद, कृष्ण चतुर्थी का चाँद
तीन चीज़ें, पूरा व्रत: करवा वह मिट्टी का घड़ा है जिससे चाँद को अर्घ दिया जाता है, छलनी वह है जिससे चाँद देखा जाता है, और चंद्रमा, कृष्ण चतुर्थी का पूर्णिमा से थोड़ा घटता चाँद, वह है जिसकी प्रतीक्षा में दिन बितता है

कुछ व्रत पंचांग से शुरू होते हैं, कुछ रसोई से। करवा चौथ सास के भेजे एक डिब्बे से शुरू होता है, सरगी से, जो सुबह से पहले, अंधेरे में खाया जाता है, और खत्म होता है रात में एक छलनी से झाँकते चाँद पर। बीच का पूरा दिन एक इंतज़ार है, और उस इंतज़ार के अपने नियम, अपने गीत और अपनी कथाएँ हैं। यह लेख इस व्रत को पूरा खोलता है: नाम में छिपी तारीख, मिट्टी के घड़े की उत्पत्ति, सरगी से फेरियों तक की रीतें, तीन प्रसिद्ध कथाएँ, आज के रूप पर चलती बहस, और 2027 की तारीख।

नीचे की हर बात 31 अक्टूबर 2026 को लिए गए दो स्रोतों से आई है: विकिपीडिया का करवा चौथ लेख और द्रिकपंचांग का करवा चौथ 2027 पृष्ठ (नई दिल्ली)। जहाँ विकिपीडिया की पंक्ति पर उद्धरण की ज़रूरत अंकित है, हमने उसे भी अंकित किया है। कथाओं को कथाओं के रूप में पढ़िए; यह लेख किसी व्रत के फल का वादा नहीं करता।

नाम में ही तारीख छिपी है

करवा चौथ को संस्कृत ग्रंथों में करक चतुर्थी कहा गया है, विकिपीडिया बताती है: करक यानी मिट्टी का जल-घड़ा, चतुर्थी यानी चांद्र महीने का चौथा दिन। दिन है कृष्ण पक्ष की चतुर्थी, पूर्णिमांत गिनती में कार्तिक की। पर यहाँ एक पंचांग-सूक्ष्मता है जो हमारे अमांत-पूर्णिमांत लेख के पाठकों को पहचानी लगेगी: द्रिकपंचांग लिखता है कि गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत की अमांत पद्धति में उस दिन आश्विन माह चलता है, कार्तिक नहीं, और फिर साफ करता है कि अंतर केवल महीने के नाम का है, सभी राज्यों में करवा चौथ एक ही दिन पड़ता है। दो कैलेंडर, दो महीने के नाम, एक ही तारीख।

उसी दिन का एक और पहलू: द्रिकपंचांग के अनुसार करवा चौथ संकष्टी चतुर्थी के साथ पड़ता है, गणेश के व्रत-दिवस के साथ, और पूजा में शिव-परिवार के साथ गणेश भी स्थान पाते हैं, इसीलिए कई इलाकों की कथा-वाचन में गणेश की उपस्थिति स्वाभाविक है।

घड़ा कहाँ से आया

करवा शब्द का अर्थ है छोटा मिट्टी का जल-घड़ा, और उत्पत्ति पर विकिपीडिया दो-तीन व्याख्याएँ रखती है, कोई अंतिम नहीं। एक व्याख्या राजपूत अभियानों से जुड़ती है: उत्तर-पश्चिम के घरों से पुरुष दूर युद्धों पर जाते थे और पत्नियाँ उनके सकुशल लौटने की प्रार्थना करती थीं। दूसरी व्याख्या मौसम की है: यह पर्व गेहूं बुवाई के समय, रबी चक्र की शुरुआत, के साथ पड़ता है, और गेहूं भरने वाले बड़े मिट्टी के घड़ों को भी करवा कहा जाता था, तो संभव है कि व्रत की शुरुआत गेहूं-प्रधान इलाके की फसल-प्रार्थना से हुई हो। दोनों पठन विकिपीडिया के हैं; हमारे पास इन्हें तौलने का कोई और प्रमाण नहीं।

तीसरी कथा सामाजिक है, और विकिपीडिया ने उस पर उद्धरण की ज़रूरत अंकित की है: नई दुल्हन ससुराल में अकेली होती थी, तो विवाह में ही एक सहेली, कंगन-सहेली या धर्म-बहन, बनाई जाती थी, उम्र में करीब, उसी गाँव में विवाहित, और रिश्तेदारियों से दूर, ताकि भावनात्मक सहारा बना रहे। कहा जाता है कि करवा चौथ इसी नारी-बंधन के उत्सव में बदल गया। और एक रीत जो इस कथा से जुड़ती है: पर्व से पहले सुहागनें नए करवे खरीदतीं, उन्हें बाहर से रंगतीं, भीतर चूड़ियाँ, रिबन, मिठाई और श्रृंगार भरतीं, और करवा चौथ के दिन एक-दूसरे से बदलतीं। यह विवरण भी उद्धरण-रहित अंकित है, पर गीतों में करवे का आदान-प्रदान आज भी गूँजता है।

करवे के बारे में विकिपीडिया एक ठोस विवरण भी रखती है: पारंपरिक करवा गोल मिट्टी का घड़ा होता है, सात से नौ इंच व्यास और दो से तीन लीटर क्षमता का। और द्रिकपंचांग बताता है कि करवा केवल अर्घ का पात्र नहीं, दान की भी वस्तु है: पूजा में इसका विशेष महत्व है और इसे ब्राह्मण या किसी योग्य स्त्री को दान में दिया जाता है। यानी वह घड़ा, जिससे दिन शुरू होता है, दान में निकल जाता है, और रीत में वस्तु का चक्र पूरा होता है: खरीदा, सजाया, भरा, बदला, चढ़ाया और दान किया गया।

सरगी: सुबह से पहले की सुबह

व्रत का पहला पड़ाव व्रत से पहले आता है। पंजाब की परंपरा में, विकिपीडिया के अनुसार, व्रत रखने वाली महिलाएँ सूर्योदय से ठीक पहले उठकर खाती-पीती हैं, और इस भोजन का नाम सरगी है, जिसमें फेनिया अवश्य होती है। सरगी देने का काम सास का है: सास भेजती है या बनाती है। उत्तर प्रदेश में पर्व की पूर्व-संध्या पर दूध-चीनी के साथ सूत फेनियाँ खाई जाती हैं; कहा जाता है, और विकिपीडिया इसे 'कहा जाता है' करके ही देती है, कि इससे अगले दिन बिना पानी रहना आसान होता है। दोनों रीतों में एक ही ढाँचा दिखता है: व्रत की थाली प्यार से सजती है, और उसे सजाने वाला हाथ किसी और का होता है।

दिन भर की रीतें

दिन सज-धज का है: व्रत रखने वाली महिलाएँ श्रृंगार करती हैं, मेहंदी रचती हैं, और घर या मंदिर में शाम की पूजा की तैयारी होती है। विकिपीडिया नोट करती है कि सजने-संवरने की रीतों की वजह से भी यह पर्व महिलाओं के बीच बंधन बुनता है। व्रत का चरित्र कठोर बताया गया है: द्रिकपंचांग लिखता है कि यह सूर्योदय के बाद से चंद्र-दर्शन तक बिना भोजन और बिना एक बूँद पानी के रखा जाता है। हम इसे यहाँ परंपरा के वर्णन के रूप में दर्ज कर रहे हैं; इस पर हमारा ईमानदार नोट आगे आएगा।

शाम का चक्र: पूजा, कथा और फेरियाँ

शाम को व्रत धारण करने वाली महिलाएँ एक चक्र में बैठती हैं, हर एक के पास अपनी पूजा की थाली। इलाके और समुदाय के अनुसार करवा चौथ की कथा का कोई रूप सुनाया जाता है, बीच-बीच में ठहराव के साथ, और कथा सुनाने वाली आमतौर पर कोई बुज़ुर्ग महिला या पुजारी होता है। करवा चौथ का पूजा-गीत सामूहिक गाया जाता है। उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में ठहरावों में फेरियाँ होती हैं: महिलाएँ चक्र में अपनी थालियाँ एक-दूसरे को घुमाती हैं; कुछ भागों में कथा सुनते समय हाथ में चावल या भोजन रखा जाता है।

उस गीत की बनावट दिलचस्प है। विकिपीडिया बताती है कि पहली छह फेरियाँ व्रत की मनाहियाँ गिनाती हैं और सातवीं उन्हें उठा देती है। मनाहियों में है कपड़ा बुनना, किसी को मनाने की कोशिश करना, और सोते को जगाना; पहली छह फेरियों में ये 'ना' के साथ गाई जाती हैं, और सातवीं में वही पंक्तियाँ 'भी' के साथ, यानी व्रत पूर्ण हुआ और बंधन खुले। एक ही धुन में व्रत की सीमा और उसका पारण दोनों लिखे हैं।

इलाके अपने-अपने रंग जोड़ते हैं। उत्तर प्रदेश और राजस्थान में महिलाएँ खरवा, एक दूध की मिठास, सात बार आपस में बदलती हैं। राजस्थान में अर्घ से पहले सात बार जल अर्पित करते समय पूछा जाता है, 'ढापी की नी ढापी?', और उत्तर आता है, 'जल से ढापी, सुहाग से ना ढापी', पानी से तृप्त हूँ, पति के प्यार से नहीं। उत्तर प्रदेश की एक रीत में गौर माता की पूजा होती है: थोड़ी मिट्टी लेकर जल छिड़ककर उस पर कुमकुम चढ़ाया जाता है, सरजमीं की माता के प्रतीक के रूप में; पहले गौर माता की प्रतिमा मिट्टी और गोबर की बनती थी, अब उसकी जगह पार्वती की प्रतिमा ने ले ली है।

छलनी और चाँद

फेरों के बाद इंतज़ार का आखिरी चरण: चंद्रोदय की प्रतीक्षा। विकिपीडिया के अनुसार चाँद दिखते ही, इलाके और समुदाय के अनुसार, व्रती महिला चाँद को या जल-भरे पात्र में उसकी परछाई को छलनी से या दुपट्टे के कपड़े से देखती है, और फिर उसी छलनी से पति का मुख देखती है। चाँद को जल का अर्घ दिया जाता है, चंद्र देव के आशीर्वाद के लिए। कुछ इलाकों में इस क्षण पति के दीर्घायु की छोटी प्रार्थना कही जाती है, और यह मान्यता भी दर्ज है कि व्रत से आध्यात्मिक रूप से सशक्त स्त्री यम से भी टकराकर उन्हें हरा सकती है, यह मान्यता का वर्णन है, हमारा वादा नहीं। राजस्थान में महिलाएँ कहती हैं: जैसे सोने का हार और मोतियों का कंगन, वैसे ही मेरा सुहाग चाँद की तरह सदा चमकता रहे।

तीन कथाएँ

कथा-वाचन में तीन कथाएँ घूमती हैं, और तीनों को विकिपीडिया ने दर्ज किया है। पहली रानी वीरावती की है: सात भाइयों की इकलौती बहन, जो अपना पहला करवा चौथ मायके में कर रही थी। शाम तक प्यास से व्याकुल देखकर भाइयों ने पीपल के पेड़ में दर्पण से नकली चाँद बना दिया; वीरावती ने व्रत खोला, और तीसरे ग्रास पर पति के निधन की खबर आई। देवी के बताने पर उसने पूरे समर्पण से व्रत दोहराया, और कथा कहती है कि यम को उसके पति को जीवन लौटाना पड़ा। दूसरी करवा नामक स्त्री की है: नदी में स्नान करते उसके पति को मगर ने पकड़ लिया; करवा ने मगर को सूती धागे से बाँध दिया और यम से नरक भेजने की माँग की, और अपने वचन की शक्ति से पति को दीर्घायु पाया। तीसरी महाभारत से जुड़ती है: अर्जुन के नीलगिरि गए जाने पर विपत्तियों में घिरी द्रौपदी ने कृष्ण से सहायता माँगी; कृष्ण ने उसे याद दिलाया कि ऐसी ही स्थिति में पार्वती को शिव ने करवा चौथ का व्रत बताया था, और द्रौपदी ने व्रत किया और पांडवों की बाधाएँ टल गईं। कुछ पाठों में शिव पार्वती को वही वीरावती-कथा सुनाते हैं, कथाएँ एक-दूसरे में गूँथी हैं। इन तीनों को हम लोककथा के रूप में दर्ज करते हैं, प्रमाण के रूप में नहीं।

आज का पर्व, और साथ चलती बहस

विकिपीडिया का आधुनिक खंड पर्व की बदली छवि दिखाता है। आज के उत्तर भारत में करवा चौथ एक रोमांटिक पर्व के रूप में देखा जाता है, पति-पत्नी के प्रेम का प्रतीक; विज्ञापन इस पर चलते हैं, और हिंदी सिनेमा ने इसे घर-घर पहुँचाया, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे में अविवाहित नायिका का नायक के लिए व्रत और उसका चुपके से साथ रखना, बागबान में दूर रहते पति का फोन पर पत्नी से व्रत खोलने की गुज़ारिश। अविवाहित महिलाओं के समूह भी दोस्ती या भावी साथी की कामना में व्रत रखते हैं, और पर्व उन समुदायों में भी फैला है जो इसे परंपरा से नहीं जानते थे, गुजरात और मुंबई के प्रवासी समुदायों तक। बंगाल, पूर्वोत्तर और भूटान के कुछ भागों की एक विशिष्ट रीत में किशोर लड़के भी सुहागनों के साथ व्रत में शामिल होते हैं। लेख यह भी दर्ज करता है कि अकेली महिलाओं के लिए पर्व की रोमांटिक छवि कठिन भी पड़ सकती है। हम ये सब बिना पक्ष लिए दर्ज करते हैं; पर्व कैसा महसूस हो, यह उसके रखने वालों और न रखने वालों, दोनों का है।

व्रत का ईमानदार नोट

यह खंड हमारा अपना है, स्रोतों का नहीं। ऊपर जो वर्णन आया, वह परंपरा का है: निर्जला व्रत, यानी सूर्योदय से चंद्र-दर्शन तक न अन्न न जल, जैसा द्रिकपंचांग लिखता है। हम उसे वर्णन के रूप में दर्ज करते हैं, सलाह के रूप में नहीं। बिना पानी का एक लंबा दिन हर शरीर पर एक जैसा नहीं पड़ता: गर्भवती, बीमार, बुज़ुर्ग, नियमित दवा लेने वाले, या जिन्हें डॉक्टर ने व्रत से मना किया हो, उनके लिए यह पृष्ठ कोई आधार नहीं है, डॉक्टर की सलाह आधार है। किसी से व्रत का हक़ नहीं माँगा जा सकता, न रिश्ते में, न घर में। और जो रखते हैं, उनके लिए भी हम कोई फल-गारंटी नहीं देते: कथाएँ श्रद्धा की भाषा बोलती हैं, और हम उन्हें श्रद्धा के रूप में ही छापते हैं। जो चाहे व्रत की जगह कथा, गीत और सामूहिक भोजन में हिस्सा लेकर भी पर्व का हिस्सा हो सकता है, परंपरा में उसके लिए भी जगह है।

2027 की तारीख और समय

द्रिकपंचांग के नई दिल्ली पंचांग से: करवा चौथ सोमवार, 18 अक्टूबर 2027। पूजा मुहूर्त शाम 5:49 से 7:04, उपवास का समय सुबह 6:23 से शाम 7:35, तेरह घंटे ग्यारह मिनट, और उस दिन चंद्रोदय शाम 7:35 पर। चतुर्थी तिथि 18 अक्टूबर को शाम 5:51 से शुरू होकर 19 अक्टूबर को शाम 4:42 तक रहती है। ये समय नई दिल्ली के हैं; चंद्रोदय अपने शहर के क्षितिज पर होता है, इसलिए अपने शहर के चंद्रोदय और पूजा मुहूर्त के लिए उसी दिन का स्थानीय पंचांग देखिए।

तारीख का एक पैटर्न भी देखने लायक है। विकिपीडिया की वार्षिक तालिका में करवा चौथ 2020 में 4 नवंबर को था और 2021 में 24 अक्टूबर को, और 2027 में वह 18 अक्टूबर पर है। यह भटकाव कोई गड़बड़ी नहीं: चांद्र तिथि साढ़े उन्नीस दिन छोटी-बड़ी होती है और सौर वर्ष से बँधी नहीं, इसलिए पर्व हर साल अक्टूबर-नवंबर की खिड़की में ऊपर-नीचे खिसकता है। इसीलिए करवा चौथ की तारीख याद रखने की बजाय हर साल पंचांग से पढ़ी जाती है।

घड़ा, छलनी, चाँद

करवा चौथ को समझने के लिए तीन चीज़ें काफी हैं। घड़ा, जो नाम देता है और जिसमें अर्घ का जल भरता है, और जिसकी उत्पत्ति कहीं युद्ध-वियोग की प्रार्थनाओं में, कहीं गेहूं के भंडार में, कहीं धर्म-बहनों के हाथों में मिलती है। छलनी, जो चाँद और चेहरे के बीच आती है, जैसे प्रेम को भी छनकर देखना पड़ता है। और चाँद, जो तिथि से नहीं, क्षितिज से आता है, इसीलिए हर शहर का पारण अपने समय पर होता है। बीच का दिन गीतों, थालियों और सात फेरियों का है, और पहली छह फेरियों की मनाही सातवीं में खुल जाती है। जो व्रत रखता है, उसके लिए यह दिन लंबा है; जो नहीं रखता, उसके लिए भी यह दिन कुछ कहता है, कि इंतज़ार भी एक रीत हो सकती है, अगर उसमें गीत हों।

आम सवाल

इस लेख के सवाल

2027 में करवा चौथ कब है?

द्रिकपंचांग के नई दिल्ली पंचांग के अनुसार सोमवार, 18 अक्टूबर 2027। पूजा मुहूर्त शाम 5:49 से 7:04, उपवास का समय सुबह 6:23 से शाम 7:35, और उस दिन चंद्रोदय शाम 7:35 पर। तिथि और शहर बदलने से समय बदलते हैं, इसलिए अपने शहर का पंचांग देख लें।

करवा चौथ किस महीने में आता है?

दोनों जवाब सही हैं। यह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को होता है: पूर्णिमांत पद्धति में कार्तिक माह में, और अमांत पद्धति में, जो गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में चलती है, आश्विन माह में। द्रिकपंचांग बताता है कि अंतर केवल महीने के नाम का है; सभी राज्यों में करवा चौथ एक ही दिन मनाया जाता है।

क्या अविवाहित महिलाएँ भी यह व्रत रखती हैं?

परंपरागत रूप से यह व्रत सुहागन महिलाओं का है, पर विकिपीडिया दर्ज करती है कि आज शहरी इलाकों में अविवाहित महिलाओं के समूह भी इसे दोस्ती या भविष्य के अच्छे जीवनसाथी की कामना में रखते हैं, और यह प्रचलन सार्वभौमिक से दूर है। कुछ इलाकों में इसका प्रसार उन समुदायों में भी हुआ है जो परंपरा से इसे नहीं मानते थे।

क्या करवा चौथ में सचमुच पानी भी नहीं पिया जाता?

परंपरा का वर्णन यही है: द्रिकपंचांग लिखता है कि यह व्रत कठोर है, सूर्योदय के बाद से रात में चाँद दिखने तक भोजन और पानी दोनों के बिना। हम इसे केवल वर्णन के रूप में दर्ज करते हैं, सलाह के रूप में नहीं। बिना पानी का दिन हर शरीर के लिए सुरक्षित नहीं; गर्भावस्था, बीमारी, उम्र या दवा की स्थिति में डॉक्टर की सलाह मानिए, किसी त्योहार-पृष्ठ की नहीं, और कोई किसी से व्रत का हक़ नहीं माँग सकता।

अमन राज · संस्थापक और संपादक

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