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त्योहार

नवरात्रि: साल के चार दरवाज़े, और हर दरवाज़े के पीछे खड़ी नौ रातें

नवरात्रि साल में एक नहीं चार बार आती है; नौ देवियों की सूची इलाके और संप्रदाय के साथ बदलती है, दिन-रंगों पर स्रोत टकराते हैं, और हर इलाका अपनी रीत रखता है। चारों दरवाज़े, नौ रातें, क्षेत्रीय रीतें और 2027 की तारीखें, स्रोत-सहित।

बारह चांद्र महीनों की एक क्षैतिज पट्टी, जिस पर चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ के स्थानों पर दरवाज़े के निशान; आश्विन का दरवाज़ा टेराकोटा रंग में भरा और बड़ा, आषाढ़ और माघ के दरवाज़े बिंदु-रेखा से बने, गुप्त अंकित
साल के चार दरवाज़े: महाकाल संहिता के अनुसार चार नवरात्रियाँ हैं, चैत्र, आषाढ़ (गुप्त), आश्विन और माघ (गुप्त); कलियुग में आश्विन की शारदीय नवरात्रि सबसे प्रमुख है, इसलिए उसका दरवाज़ा भरा और बड़ा है

अक्टूबर की उन नौ रातों को कोई भूले नहीं, जब मोहल्लों में पंडाल उठते हैं, गरबे की थाप सुनाई देती है और घरों में अखंड ज्योत जलती है। पर वह पूरी कहानी नहीं है। परंपरा साल में नौ रातों के चार चक्कर गिनती है, नौ देवियों की एक सूची नहीं, कई सूचियाँ हैं, और जिस दिन-रंग को कोई एक स्रोत पीला कहता है, दूसरा उसे शाही नीला कहता है। यह लेख नवरात्रि की पूरी बनावट खोलता है: साल के चार दरवाज़े, नौ रातों की देवी-सूचियाँ और उनका मतभेद, घटस्थापना से विजयादशमी तक की प्रक्रिया, इलाके-दर-इलाके की रीतें, और 2027 की तारीखें।

नीचे की हर बात 31 अक्टूबर 2026 को लिए गए चार स्रोतों से आई है: द्रिकपंचांग का नवरात्रि-परिचय पृष्ठ, उसी साइट का चैत्र नवरात्रि 2027 और शारदीय नवरात्रि 2027 का नई दिल्ली कैलेंडर, और विकिपीडिया का नवरात्रि लेख। जहाँ कोई ग्रंथ इनके माध्यम से उल्लिखित है, जैसे महाकाल संहिता या देवीमाहात्म्य, वह अप्रत्यक्ष उद्धरण है और अंकित किया गया है; हमने वे ग्रंथ स्वयं नहीं खोले। जहाँ दो स्रोत टकराते हैं, दोनों पठन दिए गए हैं और मतभेद अनसुलझा छोड़ा गया है।

साल के चार दरवाज़े

नवरात्रि का अर्थ है नौ रातें, और पर्व नौ रात दस दिन चलता है। पर कौन-सी नौ रातें? द्रिकपंचांग महाकाल संहिता के हवाले से लिखता है कि हिंदू कैलेंडर में चार नवरात्रियाँ हैं: शारद नवरात्रि, चैत्र नवरात्रि, माघ गुप्त नवरात्रि और आषाढ़ गुप्त नवरात्रि। यह ग्रंथ का दावा है जो हम तक द्रिकपंचांग के पृष्ठ से पहुँचा, अप्रत्यक्ष उद्धरण। विकिपीडिया इसी ढाँचे की पुष्टि करती है: सैद्धांतिक रूप से चार ऋतु-नवरात्रियाँ हैं, माघ (जनवरी-फरवरी), चैत्र (मार्च-अप्रैल), आषाढ़ (जून-जुलाई) और आश्विन (सितंबर-अक्टूबर), पर व्यवहार में आश्विन की शरद ऋतु की नवरात्रि ही धूमधाम से मनती है। दोनों गुप्त नवरात्रियों के बारे में विकिपीडिया लिखती है कि वे क्षेत्रीय रूप से या व्यक्तिगत स्तर पर मनाई जाती हैं; गुप्त का अर्थ ही है छिपा हुआ, ये साधना की नवरात्रियाँ हैं, उत्सव-प्रदर्शन की नहीं।

द्रिकपंचांग एक कुरीला सा क्रम भी देता है, फिर महाकाल संहिता के माध्यम से: हर युग में एक अलग नवरात्रि प्रमुख है। सत्ययुग में चैत्र की वसंत नवरात्रि, त्रेता में आषाढ़ की गुप्त नवरात्रि, द्वापर में माघ की गुप्त नवरात्रि, और कलियुग में आश्विन की शारदीय नवरात्रि। यह पढ़ने में अजीब लग सकता है कि आज सबसे बड़ा पर्व वह है जो सबसे 'नए' युग का है, पर यही ग्रंथ की व्याख्या है कि कलियुग में शारदीय नवरात्रि का महत्व सबसे ऊँचा है। हमारे पढ़े दोनों स्रोत इस बात पर मिलते हैं कि चारों में से चौथी ही वह दरवाज़ा है जिससे आज पूरा देश गुज़रता है।

बारह चांद्र महीनों की क्षैतिज पट्टी जिस पर चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ में दरवाज़े के निशान; आश्विन का दरवाज़ा भरा और बड़ा, आषाढ़ और माघ के दरवाज़े बिंदु-रेखा के, गुप्त अंकित
चार दरवाज़े: चैत्र और आश्विन के दरवाज़े खुले, आषाढ़ और माघ के गुप्त, और कलियुग की अगुवा शारदीय नवरात्रि टेराकोटा में भरी।

नौ रातें, एक देवी, कई सूचियाँ

नौ रातें नौ रूपों को समर्पित हैं, यह दोनों स्रोतों में साफ है। पर किन नौ रूपों को, इस पर परंपरा एक सूची नहीं रखती। द्रिकपंचांग पहले वह सूची देता है जो शैव संप्रदाय की है और जो उत्तर भारत में प्रचलित है, प्रतिपदा से नवमी तक हर तिथि की अध्यक्ष देवी: शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। यही वह क्रम है जो उत्तर भारत के पंजीकृत पृष्ठों, पूजा-पाठों और कैलेंडरों में छपता है, और विकिपीडिया का दिन-वार खंड भी ठीक इसी क्रम को चलता है।

अब वह हिस्सा जो सामान्य परिचय-लेख छोड़ देते हैं। द्रिकपंचांग उसी पृष्ठ पर दक्षिण भारत की अलग सूची छापता है: वनदुर्गा, शूलिनी, जातवेदा, शांति, शबरी, ज्वालादुर्गा, लवणदुर्गा, असुरिदुर्गा और दीपदुर्गा। एक भी नाम उत्तरी सूची से नहीं मिलता। और पृष्ठ आगे कहता है कि वैष्णव संप्रदाय और माध्व संप्रदाय भी नवरात्रि में पूजी जाने वाली अपनी-अपनी नौ देवियों की सूचियाँ रखते हैं। स्रोत की अपनी भाषा में, पूज्य देवियों की सूची इलाके और संप्रदाय के अनुसार बदल सकती है। हम यहाँ दो सूचियों में से एक को 'असली' ठहराने की कोशिश नहीं करते; दोनों छपी परंपराएँ हैं, और मतभेद जस का तस दर्ज है। आपके घर में जो सूची चली आती है, वही आपकी सूची है।

उत्तरी क्रम के कुछ रूपों को विकिपीडिया करीब से दिखाती है। पहले दिन की शैलपुत्री, पहाड़ की पुत्री, हिमवान की बेटी के रूप में पार्वती का रूप, नंदी पर सवार, दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ में कमल; लेख उन्हें सती का पुनर्जन्म भी बताता है। सातवें दिन की कालरात्रि दुर्गा का सबसे उग्र रूप है; कथा कहती है कि शुंभ और निशुंभ असुरों का वध करने के लिए पार्वती ने अपनी गौर त्वचा उतार दी थी। नौवें दिन की सिद्धिदात्री कमल पर विराजी चार भुजाओं वाली देवी हैं, जिन्हें अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व, आठों सिद्धियाँ देने वाली माना जाता है, और अर्धनारीश्वर रूप से जोड़ा जाता है। यह दिन-वार चित्रण विकिपीडिया का है; कई पंक्तियों पर वहाँ उद्धरण की ज़रूरत अंकित है, इसलिए इन्हें लोकप्रिय परिचय के रूप में पढ़िए, प्रमाणित ग्रंथ-विवरण के रूप में नहीं।

रंगों का मामला, जहाँ स्रोत टकराते हैं

नवरात्रि के दिन-रंग आजकल कैलेंडर और सोशल मीडिया का पसंदीदा विषय हैं, और यहीं हमें एक साफ स्रोत-टकराहट मिली। विकिपीडिया अपने दिन-वार खंड में पहले दिन, शैलपुत्री के दिन, का रंग पीला बताती है, क्रिया और उत्साह का प्रतीक। द्रिकपंचांग का चैत्र नवरात्रि 2027 कैलेंडर उसी पहले दिन, 7 अप्रैल 2027, घटस्थापना और शैलपुत्री पूजा के दिन, का रंग शाही नीला छापता है। एक ही देवी, एक ही तिथि-क्रम, दो अलग रंग। आगे भी क्रम नहीं मिलता: विकिपीडिया सातवें दिन, कालरात्रि, को शाही नीला देती है, जबकि द्रिकपंचांग के 2027 कैलेंडर में महासप्तमी, 13 अप्रैल, का रंग लाल है।

दोनों सूचियाँ अपनी-अपनी जगह ईमानदार हैं, और शायद दोनों के पीछे अलग परिपाटियाँ हैं, एक देवी से जुड़ी रंग-परंपरा और दूसरी किसी चलती कैलेंडर-परिपाटी, पर हमारे पढ़े पृष्ठ अपने रंग-क्रम का स्रोत नहीं बताते, और विकिपीडिया के कई रंग-वाक्यों पर उद्धरण की ज़रूरत अंकित है। इसलिए हम यहाँ कोई समाधान नहीं ठुकराते: अगर आप दिन-रंग पहनने की रीत निभाते हैं, तो जान लीजिए कि यह आधुनिक लोकप्रिय परत है, और उसी दिन के लिए दो बड़े स्रोत अलग रंग कह सकते हैं। जिस परिपाटी का आप अनुसरण करते हैं, उसी का कैलेंडर देखिए।

महिषासुर की तीन कल्प-कथाएँ और अकाल बोधन

नवरात्रि के मूल की कथा महिषासुर-वध है, पर यहाँ भी ग्रंथ एक आवाज़ में नहीं बोलते। द्रिकपंचांग लिखता है कि अलग धार्मिक ग्रंथ वध करने वाली दुर्गा के अलग रूप बताते हैं: रंभा कल्प के अनुसार अठारह भुजाओं वाली उग्रचंडी ने महिषासुर का वध किया, नीललोहित कल्प के अनुसार सोलह भुजाओं वाली भद्रकाली ने, और श्वेतवाराह कल्प के अनुसार दस भुजाओं वाली कात्यायनी ने। तीन कल्प-ग्रंथ, तीन रूप। पृष्ठ आगे कहता है कि अधिकांश ग्रंथ इस बात पर सहमत हैं कि महिषासुर का वध दुर्गा के किसी उग्र रूप से हुआ, और इसीलिए नवरात्रि बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाई जाती है। ये सभी कल्प-उल्लेख द्रिकपंचांग के माध्यम से अप्रत्यक्ष हैं।

उसी पृष्ठ से दूसरी कथा, जो बंगाल की दुर्गा पूजा की आत्मा बन गई। मान्यता है कि भगवान राम ने शारद नवरात्रि में देवी दुर्गा की उपासना की: ब्रह्मा की सलाह पर, रावण पर युद्ध छेड़ने से पहले उन्होंने देवी का आह्वान किया और आशीर्वाद माँगा। चूँकि यह आह्वान देवी के शयन-काल में हुआ, समय से पहले का, इसीलिए शारद नवरात्रि में दुर्गा के इस असामयिक जागरण को अकाल बोधन कहा जाता है। विकिपीडिया दिखाती है कि बंगाल में दुर्गा पूजा की षष्ठी की विधियों में अकाल बोधन आज भी दर्ज है।

शुरुआत: घटस्थापना

नवरात्रि का पहला संस्कार घटस्थापना है, और द्रिकपंचांग के 2027 कैलेंडर में चैत्र और शारद, दोनों नवरात्रियों का पहला दिन इसी से खुलता है। विकिपीडिया के उत्तर प्रदेश खंड से प्रक्रिया का घरेलू चित्र: मिट्टी या धातु का एक घड़ा जल से भरा जाता है, ऊपर नारियल और आम के पत्ते या जौ रखी जाती है, और वह मिट्टी के एक छोटे चबूतरे पर स्थापित होता है जिसमें जौ के बीज बोए जाते हैं। घड़े के पास अखंड ज्योत, एक तेल का दीपक, जलाया जाता है जो नौ दिन लगातार जलता रहता है। वर्णन में घड़े को ब्रह्मांड का प्रतीक और ज्योत को दुर्गा की अखंड शक्ति का चिह्न कहा गया है।

बिहार, झारखंड और पूर्वांचल में पहले दिन की रीत का एक अपना रूप है, कलश यात्रा: श्रद्धालु मंदिर या पवित्र नदी से कलश में जल लाते हैं, केले के पत्ते पर चावल और अनाज रखकर, मिट्टी और रेत का टीला बनाकर उसमें भीगे जौ बोए जाते हैं, और कलश माथे पर उठाकर घर या मंदिर लाया जाता है। नौ दिन हवन की परंपरा भी वहाँ दर्ज है। यह वही घटस्थापना है, क्षेत्र की अपनी भाषा में। और जो जौ पहले दिन बोया गया, वह दसवें दिन लौटता है: बिहार की परंपरा में दशहरा की सुबह उगे जौ को काटकर गाँठें बनाई जाती हैं और पुरुषों और लड़कों के बालों में बाँधी जाती हैं, जयंती, और उसी के बाद यात्रा की मनाही खुलती है, इसीलिए वहाँ दशहरा को जात्रा भी कहते हैं।

आठवाँ, नौवाँ और दसवाँ दिन

नवरात्रि का अंतिम चरण तीन दिनों में घनिष्ठ होता है। द्रिकपंचांग के चैत्र 2027 कैलेंडर में आठवाँ दिन, 14 अप्रैल, एक साथ कई नाम लेता है: दुर्गा अष्टमी, महागौरी पूजा, अन्नपूर्णा अष्टमी और संधि पूजा, जिसका समय उस दिन दोपहर 2:59 से 3:47 तक अंकित है। संधि पूजा अष्टमी और नवमी की संधि, जोड़ के क्षण, की पूजा है, और बंगाल की परंपरा में इसका विशेष स्थान है। अष्टमी या नवमी को कन्या पूजा होती है, जिसे कुमारी पूजा भी कहते हैं: द्रिकपंचांग इसे ज्योति कलश के साथ नवरात्रि की मुख्य विधियों में गिनता है।

पंजाब में इसी विधि को कंजक कहते हैं, और विकिपीडिया का विवरण रीत को ठोस बनाता है: आठवें दिन छोटी लड़कियों को घर बुलाया जाता है, आमतौर पर नौ, दुर्गा के नौ रूपों के प्रतीक, और उन्हें पूरी, काले चने और सूजी के हलवे का प्रसाद खिलाया जाता है। घर के लोग लड़कियों की कलाई पर लाल धागा बाँधते हैं और लाल चूड़ियाँ, बिंदी और माता दी चुननी भेंट करते हैं, और स्वयं उस दिन व्रत रखकर लड़कियों के भोजन के बाद ही पारण करते हैं। यही कन्या पूजा बिहार में कुमारी भोजन के नाम से आठवें दिन दर्ज है।

फिर दसवाँ दिन, विजयादशमी। विकिपीडिया के अनुसार दक्षिण, पूर्व, पूर्वोत्तर और उत्तर के कुछ राज्यों में यह दुर्गा पूजा के समापन का दिन है, महिषासुर पर दुर्गा की विजय और धर्म की पुनर्स्थापना की स्मृति; प्रतिमाएँ सिंदूर खेला और भावुक विदाई के बाद नदी या समुद्र में विसर्जित होती हैं। उत्तर में उसी दिन रावण के पुतले आतिशबाजी के साथ जलाए जाते हैं, बुराई के नाश का चिह्न। कर्नाटक में नौवाँ दिन आयुध पूजा का है, जिसमें द्रिकपंचांग के अनुसार हथियारों की पूजा होती थी और आज प्रतीकात्मक रूप से वाहनों और औज़ारों की होती है। और एक क्रम-भेद याद रखिए: चैत्र नवरात्रि का समापन राम नवमी पर होता है, विकिपीडिया इसे साफ कहती है, इसलिए वसंत की नवरात्रि का अस्थायी शिखर दुर्गा-विसर्जन नहीं, राम-जन्म का उत्सव है; द्रिकपंचांग का 2027 कैलेंडर 15 अप्रैल को राम नवमी अंकित करता है।

हर इलाके की अपनी रीत

गुजरात में नवरात्रि का केंद्र आरती के बाद का गरबा है, और विकिपीडिया का विवरण उस गड़बो के इर्द-गिर्द घूमता है जिसके चारों ओर नृत्य होता है: मिट्टी का एक प्रतीकात्मक घड़ा, जिसे परिवार और ब्रह्मांड की कोख की स्मृति कहा गया है। पारंपरिक गड़बे में नौ की तीन पंक्तियों में सत्ताईस छेद होते हैं, सत्ताईस नक्षत्रों के प्रतीक, और चार-चार चरण मिलाकर कुल 108 की संगति; भीतर जलता दीपक छेदों से रोशनी बिखेरता है, जिसे एक आत्मा से निकली अनेक आत्माओं का रूप कहा गया है। कितनी सुंदर बात है कि जिस पर्व में हम नक्षत्र-गिनती के दायरे में नहीं आते, उसके नृत्य-घड़े में पूरा नक्षत्र-चक्र बैठा है। वही लेख गुजरात की व्रत-रीत भी बताता है: कुछ लोग एक दिन का, कुछ नौ दिन का आंशिक उपवास रखते हैं, अनाज छोड़कर या केवल तरल आहार पर। हम व्रत को केवल उसी रूप में दर्ज करते हैं जिस रूप में स्रोत वर्णन करते हैं; स्वास्थ्य या फल के कोई वादे हमारे यहाँ नहीं हैं।

पूर्व और पूर्वोत्तर में नवरात्रि का नाम ही दुर्गा पूजा है। विकिपीडिया के अनुसार पर्व महालया से शुरू होता है, जब बांग्ला, असमिया और ओडिया परिवार अपने दिवंगत प्रियजनों को याद करते हैं और योद्धा देवी के आगमन की तैयारी करते हैं। षष्ठी को देवी का स्वागत होता है, सप्तमी, अष्टमी और नवमी को दुर्गा के साथ लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय की पूजा, और पाठ का केंद्र देवीमाहात्म्य की दुर्गा-कथाएँ हैं, यह उल्लेख भी अप्रत्यक्ष है, हमने देवीमाहात्म्य स्वयं नहीं खोला। मिट्टी की प्रतिमाएँ महीनों पहले से बनती हैं, कोलकाता के कुमारटुली के कुम्हार इस कला के लिए प्रसिद्ध हैं, और विजयादशमी को विसर्जन-जुलूस के बाद विवाहित महिलाएँ सिंदूर खेला खेलती हैं, एक-दूसरे के मुख पर सिंदूर लगाकर मिठाइयाँ बाँटती हैं।

उत्तर प्रदेश में नवरात्रि का मंच रामलीला है: ब्रज, दोआब, कन्नौज और अवध में राम-रावण कथा के दृश्य कलाकारों की मंडलियों द्वारा मंचित होते हैं, और विकिपीडिया दर्ज करती है कि इस पारंपरिक उत्सव-कला को यूनेस्को ने 2008 में मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में शामिल किया, रामचरितमानस पर आधारित गीत, वाचन और संवाद के साथ। दक्षिण में रीत बिल्कुल और है: द्रिकपंचांग के अनुसार दक्षिण भारत में नवरात्रि का पर्याय बोम्मला कोलुवु या गोलू है, गुड़ियों का पर्व, जहाँ गुड़ियों को सीढ़ियों-नुमा चौकियों पर सजाया जाता है, और नौ दिन तीन-तीन के हिस्सों में बँटे हैं, पहले तीन काली के रूप में दुर्गा को, अगले तीन लक्ष्मी को, अंतिम तीन सरस्वती को।

2027 की तारीखें

द्रिकपंचांग के नई दिल्ली पंचांग से, दोनों खुली नवरात्रियों की 2027 की तारीखें। चैत्र नवरात्रि: घटस्थापना 7 अप्रैल 2027, बुधवार, और नौवाँ दिन राम नवमी 15 अप्रैल, गुरुवार। शारदीय नवरात्रि: घटस्थापना 1 अक्टूबर 2027, शुक्रवार, नवमी 8 अक्टूबर, और विजयादशमी 9 अक्टूबर, शनिवार। गुप्त नवरात्रियों की तारीखें हमने इस बार नहीं लीं, इसलिए यहाँ नहीं छाप रहे। और सामान्य चेतावनी: तिथि सूर्य-चंद्र की गति से बँधी है, घड़ी के दिन से नहीं, इसलिए पंचांग बदलने या शहर बदलने से किसी तिथि का दिन एक दिन इधर-उधर हो सकता है। अपने नगर का पंचांग ही अंतिम कागज़ है।

चार दरवाज़ों वाला साल

नवरात्रि को पढ़ते-पढ़ते एक बात साफ होती है: यह एक पर्व नहीं, एक प्रणाली है। साल में चार बार वही नौ-रातों की कलियां आती है, दो बार खुलेआम, दो बार चुपके से। एक ही देवी के रूप इतने हैं कि उत्तर और दक्षिण की सूचियों में एक भी नाम साझा नहीं, और फिर भी दोनों सूचियाँ नौ की हैं, और दोनों दुर्गा की हैं। एक ही दिन का रंग दो बड़े स्रोत अलग-अलग बताते हैं, और पर्व उस पर नहीं ठहरता। इलाके इतने बदलते हैं कि एक जगह गुड़ियाँ सजती हैं, दूसरी जगह मिट्टी की प्रतिमाएँ डूबती हैं, तीसरी जगह रावण जलता है, और चौथी जगह सत्ताईस छेदों वाले घड़े के गिर्द रात भर नृत्य होता है, और फिर भी हर जगह नौ रातें ही हैं। शायद इसीलिए परंपरा ने इसे एक दरवाज़ा नहीं, चार दरवाज़े दिए: जो मिस हो जाए, वह अगले मौसम में लौट आता है।

आम सवाल

इस लेख के सवाल

नवरात्रि साल में कितनी बार आती है?

चार बार। द्रिकपंचांग महाकाल संहिता के हवाले से चार नवरात्रियाँ गिनाता है: शारद (आश्विन), चैत्र, माघ गुप्त और आषाढ़ गुप्त, और विकिपीडिया भी यही चार ऋतु-नवरात्रियाँ दर्ज करती है। व्यवहार में आश्विन की शारदीय नवरात्रि सबसे बड़े पैमाने पर मनती है; दोनों गुप्त नवरात्रियाँ क्षेत्रीय या व्यक्तिगत साधना की हैं।

क्या नौ देवियों की सूची हर जगह एक जैसी है?

नहीं। उत्तर भारत में प्रचलित शैव सूची शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक है, पर द्रिकपंचांग दक्षिण की एक पूरी अलग सूची देता है, वनदुर्गा से दीपदुर्गा तक, और बताता है कि वैष्णव और माध्व संप्रदाय भी अपनी-अपनी सूचियाँ रखते हैं। स्रोत खुद कहता है कि सूची इलाके और संप्रदाय के साथ बदलती है; हमने यह मतभेद अनसुलझा दर्ज किया है।

2027 में नवरात्रि कब है?

द्रिकपंचांग के नई दिल्ली पंचांग के अनुसार चैत्र नवरात्रि 7 अप्रैल 2027 (बुधवार, घटस्थापना) से 15 अप्रैल (राम नवमी) तक है, और शारदीय नवरात्रि 1 अक्टूबर 2027 (शुक्रवार, घटस्थापना) से, विजयादशमी 9 अक्टूबर (शनिवार)। तिथि-सीमा के कारण पंचांग और शहर बदलने से एक दिन का अंतर संभव है, इसलिए अपने शहर का पंचांग देख लें।

नौ रातों के बाद दसवाँ दिन क्यों जोड़ा जाता है?

दसवाँ दिन विजयादशमी है। विकिपीडिया के अनुसार दक्षिण, पूर्व और पूर्वोत्तर में यह दुर्गा की महिषासुर पर विजय और दुर्गा पूजा के समापन का दिन है, जब प्रतिमाएँ विसर्जित होती हैं; उत्तर में रावण-दहन की परंपरा है। चैत्र नवरात्रि का समापन राम नवमी पर होता है, इसलिए वसंत की नौ रातों का दसवाँ रंग अलग है।

अमन राज · संस्थापक और संपादक

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