योग: सूर्य-चंद्र का योग-फल, पंचांग का सबसे देर से आया अंग
तिथि घटाव से बनती है, योग जोड़ से: 27 खंडों वाली इस गिनती-इकाई का गणित, उसका देर से आया इतिहास, सत्ताईस नाम, शुभ-अशुभ पट्टी की सच्चाई, और एक अठाईस-योग वाली अलग दुनिया।
पंचांग के पांच अंगों में से चार एक-एक सीधी खगोलीय माप हैं: तिथि चंद्रमा और सूर्य के देशांतर का अंतर है, नक्षत्र चंद्रमा की स्थिति, वार दिन-गिनती, और करण तिथि का आधा हिस्सा। पांचवां अंग, योग, इन सबसे अलग है, क्योंकि यह इकलौता अंग है जो घटाने से नहीं, जोड़ने से बनता है। विकिपीडिया के पंचांगम-पृष्ठ की परिभाषा सीधी है: योग सूर्य और चंद्रमा के कोणीय संबंध का समाप्ति-क्षण है, जहां दोनों के देशांतर जोड़े जाते हैं, चंद्रमा जमा सूर्य; एक योग 13 अंश 20 कला के योग के बराबर है, और 360 अंश में ठीक 27 योग आते हैं। यानी जहां तिथि पूछती है कि चंद्रमा सूर्य से कितना आगे निकल गया, वहीं योग पूछता है कि दोनों मिलकर कितना रास्ता तय कर चुके हैं।
यह लेख इसी एक जोड़ की पूरी कहानी है: संख्या कैसे निकलती है, एक कार्यित उदाहरण, फिर एक ईमानदार स्वीकृति जो हमारे स्रोतों में स्पष्ट लिखी है, कि यह योग-फल आकाश में किसी वास्तविक वस्तु को निर्दिष्ट नहीं करता; फिर वह स्वाभाविक सवाल कि पांचवां अंग पंचांग में आया कब, क्योंकि इसका इतिहास बाकी चार अंगों से सदियों बाद का है; सत्ताईस नामों की पूरी तालिका और उनके अर्थ; शुभ-अशुभ पट्टी का असली दर्जा; हर योग की लंबाई; और अंत में एक अलग, अठाईस-योग वाली पद्धति जो कुछ पंचांगों में साथ छपती है और जो खगोल से जान-बूझकर बिल्कुल अलग रखी गई है।
संख्या असल में क्या है
गणना तीन कदमों की है। पहला कदम: सूर्य और चंद्रमा के निरयन, यानी नाक्षत्रिक, देशांतर लीजिए। दूसरा कदम: दोनों को जोड़िए; यदि योग 360 अंश या उससे अधिक आए तो उसमें से 360 घटा दीजिए, ताकि संख्या 0 से 360 के बीच रहे। तीसरा कदम: इस योग को 13 अंश 20 कला के 27 बराबर खंडों में रखिए; जिस खंड में संख्या पड़े, वही चल रहा योग है, विष्कंभ से शुरू होकर वैधृति पर समाप्त। यह विधि shastrapanchangam के योग-विधि पृष्ठ की है, और विकिपीडिया के Nityayoga पृष्ठ पर भी यही परिभाषा है, जो 13 अंश 20 कला को 800 कला भी लिखती है। 27 गुणा 13 अंश 20 कला ठीक 360 अंश होता है, इसलिए सत्ताईसवें योग के समाप्ति-क्षण पर योग-फल फिर शून्य हो जाता है और गिनती विष्कंभ से नई शुरू होती है।
दो तकनीकी बातें यहीं दर्ज करना ज़रूरी है। पहली: जोड़ने से पहले दोनों देशांतरों पर अयनांश लगाया जाता है; shastrapanchangam स्पष्ट लिखता है कि अलग अयनांश-पद्धति योग के समाप्ति-समय को बदल सकती है, इसलिए दो पंचांगों की तुलना एक ही पद्धति के भीतर करनी चाहिए। दूसरी: योग का बदलना एक क्षण है, दिन नहीं। जैसे-जैसे सूर्य और चंद्रमा चलते हैं, उनका संयुक्त देशांतर अगले खंड में प्रवेश करता है; उसी प्रवेश-क्षण को दैनिक पंचांग-पृष्ठ योग का समाप्ति-समय दिखाते हैं। यही कारण है कि पंचांग में योग के नाम के साथ हमेशा एक घड़ी-समय छपा होता है; नाम हालत बताता है, समय सीमा।
एक कार्यित उदाहरण, हमारी अपनी गणना
नियम को एक काल्पनिक क्षण पर चलाकर देखिए। मान लीजिए किसी क्षण सूर्य का निरयन देशांतर 45 अंश है और चंद्रमा का 120 अंश। योग-फल: 45 जमा 120, यानी 165 अंश; 360 से कम है, इसलिए घटाने की ज़रूरत नहीं। अब 165 को 13 अंश 20 कला के खंडों में बांटिए: बारह पूरे खंड 160 अंश तक पहुंचते हैं, तेरहवां खंड 160 से 173 अंश 20 कला तक फैलता है, और 165 उसी में पड़ता है। सूची में तेरहवां योग व्याघात है, तो उस क्षण व्याघात योग चल रहा है। तेरहवें खंड के समाप्त होने में 8 अंश 20 कला बाकी हैं; सूर्य और चंद्रमा की संयुक्त आकाश-गति लगभग साढ़े चौदह अंश प्रतिदिन होती है, तो यह योग मोटे तौर पर चौदह घंटे बाद समाप्त होगा। यह पूरा उदाहरण, संख्याएं और घंटों का अनुमान, हमारी अपनी गणना है जो ऊपर दिए स्रोतों के नियम को ही दोहराती है; किसी पंचांग-पृष्ठ से उद्धृत वास्तविक क्षण नहीं है।
एक ईमानदार स्वीकृति: आकाश में यह कहां है?
तिथि की तुलना कीजिए: अमावस्या और पूर्णिमा आकाश में दिखती हैं; नक्षत्र चंद्रमा के सामने का तारा-समूह है। योग के लिए ऐसी कोई वस्तु नहीं है। विकिपीडिया का Nityayoga पृष्ठ यह बात असाधारण खुलकर कहता है: खगोलीय योग किसी खगोलीय घटना से संबंधित प्रतीत नहीं होते, और वह संकर बालकृष्ण दीक्षित के भारतीय ज्योतिष शास्त्र से टिप्पणी उद्धृत करता है: यह ज्ञात नहीं है कि योग आकाश में कौन-सी ग्रह-स्थिति निर्दिष्ट करता है, और यह केवल ज्योतिष में उपयोगी है। यानी जोड़ में शामिल दोनों पिंड वास्तविक हैं, पर उनका योग-फल आकाश के किसी बिंदु पर नहीं टिकता; 165 अंश का वह संयुक्त कोण किसी तारे, किसी ग्रह, किसी घटना की ओर नहीं इशारा करता। यह एक गणना-यंत्र है, एक गिनती की चौकी, और हमारे स्रोत इसे छिपाते नहीं। योग को पढ़ते समय यही सबसे स्वस्थ शुरुआत है: इसे खगोल-विज्ञान की घटना नहीं, परंपरा की गिनती-इकाई की तरह समझिए, जिसका काम मुहूर्त-चयन की पद्धति के भीतर निर्धारित है।
पंचांग में सबसे देर से आया अंग
योग का इतिहास बाकी चार अंगों से अलग एक धारणा तोड़ता है: पंचांग के पांच अंग समान उम्र के नहीं हैं। विकिपीडिया के Nityayoga पृष्ठ पर दी गई पड़ताल, जो दीक्षित के अध्ययन पर टिकी है, क्रम यह है। लगभग 505 ईस्वी में रचित वराहमिहिर की पंचसिद्धांतिका नक्षत्र और तिथि की गणना-विधियां देती है, पर योग की कोई विधि नहीं देती; उनकी बृहत्संहिता नक्षत्रों के फल पर लंबी चर्चा करती है, पर योगों के फल पर मौन है। इन संकेतों से पृष्ठ निष्कर्ष निकालता है कि वराहमिहिर के समय योग-संकल्पना अस्तित्व में नहीं थी। आगे: ब्रह्मगुप्त की लगभग 628 ईस्वी की ब्रह्मस्फुटसिद्धांत में योग का एकमात्र उल्लेख एक श्लोक है, और आंतरिक प्रमाण बताते हैं कि वह श्लोक बहुत बाद का प्रक्षेप है; उनकी लगभग 665 ईस्वी की खंडखाद्यक में योग-संबंधी दो पंक्तियां भी बाद की प्रक्षेप निर्धारित हुई हैं। पहला विस्तृत उल्लेख लल्ल के शिष्यधीवृद्धिदतंत्र में मिलता है, रचना-काल लगभग 720 से 790 ईस्वी; और सूर्यसिद्धांत, जिसे चौथी-पांचवीं शताब्दी का माना जाता है पर जिसमें लगभग 800 ईस्वी के आसपास बड़ा संशोधन हुआ, सत्ताईस योगों की वही सूची और उनकी गणना-विधि देता है जो आज के पंचांगों में है। इन सबसे पृष्ठ का निष्कर्ष: योग-संकल्पना का उदय लगभग 700 ईस्वी के आसपास हुआ, और यह पंचांग का अभिन्न अंग उसी के बाद बना, बाकी चार अंगों से सदियों बाद।
विचार कहां से आया: दो परिकल्पनाएं
इतना देर से आया अंग उठा कहां से? Nityayoga पृष्ठ दो परिकल्पनाएं दर्ज करता है, दोनों अनिर्णित। पहली महापात-परिकल्पना है: पृष्ठ बताता है कि जब सूर्य और चंद्रमा समांतर क्रांति-वृत्त पर होते हैं, तब उनके देशांतरों का योग 180 अंश होता है; ऐसा हर चांद्र-मास में दो बार होता है, और इन दो क्षणों को व्यतीपात और वैधृति कहा जाता है, दो महापात। इन महापातों को खोजने के लिए देशांतरों का योग निकालना ही पड़ता था; दीक्षित की समीक्षा के अनुसार यही अभ्यास योग-संकल्पना की ओर ले गया, ठीक वैसे जैसे अंतर निकालने से तिथि बनी थी। पृष्ठ एक सूक्ष्म प्रमाण भी जोड़ता है: ब्रह्मस्फुटसिद्धांत के दो श्लोकों में व्यतीपात शब्द आता है, पर संदर्भ से स्पष्ट है कि वहां अर्थ सूची का सत्रहवां योग नहीं, यही महापात-क्षण है। दूसरी परिकल्पना शक्तिधर शर्मा के 1998 के अध्ययन की है, जिसके अनुसार खगोलीय योग ग्रहणों की भविष्यवाणी के प्रयासों से जन्मा। दोनों में से कौन-सी सही है, पृष्ठ तय नहीं करता; हम भी नहीं।
सत्ताईस नाम और उनके अर्थ
योगों की सूची नामों की सूची है, और नाम अधिकांश सामान्य संस्कृत शब्द हैं। नीचे की तालिका विकिपीडिया के Nityayoga पृष्ठ की सूची और उसी पृष्ठ के अर्थ-अनुवाद देती है; क्रम वही है जो गणना के खंडों का क्रम है, पहला खंड विष्कंभ से सत्ताईसवां वैधृति तक।
| क्रम | योग | शाब्दिक अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | विष्कंभ | आधार या अवरोध |
| 2 | प्रीति | स्नेह, अनुराग |
| 3 | आयुष्मान | दीर्घायु |
| 4 | सौभाग्य | सौभाग्य |
| 5 | शोभन | समृद्धि, शोभा |
| 6 | अतिगंड | बड़े गाल या कर्णपाश्व वाला |
| 7 | सुकर्मा | सदाचारी |
| 8 | धृति | धैर्य, संकल्प |
| 9 | शूल | भाला, शूल |
| 10 | गंड | धब्बा, चिह्न |
| 11 | वृद्धि | वृद्धि |
| 12 | ध्रुव | अचल, स्थिर |
| 13 | व्याघात | बाधा, पराजय |
| 14 | हर्षण | हर्षित करने वाला |
| 15 | वज्र | वज्र, हीरा |
| 16 | सिद्धि | सिद्धि |
| 17 | व्यतीपात | आपदा |
| 18 | वरीयान | अति वांछनीय |
| 19 | परिघ | अवरोध, परिघ |
| 20 | शिव | कल्याणकारी |
| 21 | सिद्ध | सिद्ध |
| 22 | साध्य | साधने योग्य |
| 23 | शुभ | शुभ |
| 24 | शुक्ल | श्वेत पदार्थ |
| 25 | ब्रह्म | परमात्मा |
| 26 | इंद्र | प्रधान |
| 27 | वैधृति | महाआपदा |
अर्थ-स्तंभ को पढ़ते समय एक सावधानी: ये अनुवाद स्रोत-विशेष हैं। अतिगंड के लिए विकिपीडिया बड़े गाल या कर्णपाश्व वाला लिखती है, जबकि kaalpanchang अपनी सूची में उसे बड़ा खतरा समझाता है; विष्कंभ के लिए एक पृष्ठ आधार या अवरोध कहता है, दूसरा खंभा; गंड के लिए एक धब्बा या चिह्न, दूसरा गांठ या खतरा; वरीयान के लिए एक अति वांछनीय, दूसरा आराम। ये मतभेद संस्कृत के बहुअर्थी शब्दों से स्वाभाविक हैं, और कोई भी स्रोत अपनी पसंद का कारण नहीं देता; दोनों पाठ यथास्थिति दर्ज हैं।
शुभ-अशुभ पट्टी किसने लगाई
पंचांग-पृष्ठों पर हर योग के नाम के साथ एक शुभ या अशुभ का ठप्पा मिलता है; kaalpanchang अपनी सूची में प्रत्येक योग को स्पष्ट रूप से शुभ या अशुभ कहता है, मसलन प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, सुकर्मा, धृति, वृद्धि, ध्रुव, हर्षण, सिद्धि, वरीयान, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, इंद्र शुभ, और विष्कंभ, अतिगंड, शूल, गंड, व्याघात, वज्र, व्यतीपात, परिघ, वैधृति अशुभ। इस पट्टी का दर्जा समझना ज़रूरी है। गणना में यह भेद कहीं नहीं आता: 13 अंश 20 कला के खंड बनाने की गिनती को यह नहीं पता कि कौन-सा खंड शुभ है; यह वर्गीकरण परंपरा का मूल्यांकन है, खगोल-गणित का आउटपुट नहीं। इसकी एक झलक वज्र में भी मिलती है: शाब्दिक अर्थ वज्र और हीरा, दोनों सकारात्मक सुनने वाली चीजें, फिर भी kaalpanchang इसे अशुभ कहता है; पट्टी शब्द-अर्थ से नहीं, परंपरा की अपनी सूची से चलती है। shastrapanchangam उपयोग की सीमा भी बताता है: पारंपरिक मुहूर्त-चयन में योग को पंचांग के अन्य अंगों और किये जाने वाले कार्य की प्रकृति के साथ मिलाकर देखा जाता है, अकेले नहीं। तो किसी एक अशुभ योग को दिन का फैसला मान लेना उस पद्धति का भी दुरुपयोग है जिसमें यह सूची रहती है।
योग कितने घंटे का होता है
योग दिन-जैसी तय अवधि नहीं है। विकिपीडिया सीवेल और दीक्षित की The Indian Calendar से लंबाइयों की तालिका देती है: एक योग की औसत लंबाई 22 घंटे 35 मिनट 44.7 सेकंड, अधिकतम 24 घंटे 36 मिनट 24 सेकंड, और न्यूनतम 20 घंटे 52 मिनट 58 सेकंड; और पूरे सत्ताईस-योग चक्र की कुल लंबाई 26 दिन 10 घंटे 12 मिनट 47 सेकंड। यानी एक योग मोटे तौर पर एक दिन से थोड़ा छोटा होता है, पर किसी योग को ढाई घंटे तक कम या ज़्यादा समय मिल सकता है। लंबाई क्यों बदलती है, यह तालिका नहीं बताती; हमारा स्पष्टीकरण यह है कि सूर्य और चंद्रमा की आकाश-गति स्थिर नहीं रहती, इसलिए उनके योग-फल की वृद्धि-दर भी बदलती रहती है, यह टिप्पणी हमारी है, स्रोत केवल माप देता है। व्यावहारिक परिणाम तिथि-जैसा ही: योग दिन के किसी भी घंटे बदल सकता है, और समाप्ति-समय ही पढ़ने योग्य असली सूचना है।
एक और पद्धति भी है: अठाईस योग
भारत में योगों की एक दूसरी, पूरी तरह अलग पद्धति भी प्रचलित है, और दोनों को मिला देना पंचांग पढ़ने की आम गलती है। विकिपीडिया के अनुसार इस पद्धति में 27 के बजाय 28 योग हैं, आनंद से शुरू, नाम और नियम दोनों अलग, और इन्हें श्रीपति की ज्योतिष रत्नमाला देती है। इस पद्धति का नियम वार और नक्षत्र पर चलता है, खगोलीय योग-फल पर नहीं: यह 28 नक्षत्रों का चक्र मानती है, जिसमें अठाईसवां नक्षत्र अभिजीत भी शामिल है; मसलन रविवार को अश्विनी नक्षत्र हो तो योग आनंद, भरणी हो तो कालदंड, और उसी क्रम से आगे; सोमवार को गिनती मृगशीर्ष से शुरू होती है, और हर वार की शुरुआती नक्षत्र-स्थिति अलग। पृष्ठ स्वयं स्पष्ट करता है कि इस पद्धति का खगोलीय घटनाओं से कोई संबंध नहीं है, क्योंकि सप्ताह का सूर्य-चंद्र गति से कोई निश्चित संबंध ही नहीं, यह वही बात है जो हमारे वार-लेख में केंद्रीय थी; और यह पद्धति सूर्यसिद्धांत में नहीं मिलती। कुछ पंचांग दोनों पद्धतियों के योग साथ छपते हैं, और पृष्ठ के शब्दों में ये अठाईस केवल ज्योतिषीय रुचि के हैं। पढ़ने की सीख: पंचांग-पृष्ठ पर योग-देखते समय पहले जांचिए कि सूची सत्ताईस नामों की नाक्षत्रिक-योग पद्धति की है या वार-आधारित अठाईस की; दोनों के नाम आंशिक रूप से टकराते हैं, जैसे वज्र, सिद्धि और शुभ दोनों सूचियों में हैं, पर क्रम और अर्थ-प्रणाली अलग।
पंचांग-पृष्ठ पर योग कैसे पढ़ें
व्यावहारिक पढ़ाई तीन सवालों की है। पहला: कौन-सा योग अभी चल रहा है और उसका समाप्ति-समय क्या है? नाम के साथ छपा समय ही सीमा है; उस समय के बाद अगला योग शुरू हो जाता है। दूसरा: यदि आप दो पंचांगों या दो वेबसाइटों के योग-समय की तुलना कर रहे हैं, तो क्या दोनों की अयनांश-पद्धति एक है? shastrapanchangam चेतावनी देता है कि अयनांश-अंतर समाप्ति-समय बदल सकता है, और panchangya अपनी विधि-पृष्ठ पर लिखता है कि वहां हर मान VSOP87 आधारित खुली इंजिन-गणना से उसी क्षण निकाला जाता है, किसी छपी तालिका से नहीं; यानी दो साइटें पद्धति-अंतर से कुछ मिनट अलग दिखा सकती हैं, और वह अंतर गलती नहीं, परिपाठ-अंतर है। तीसरा: पृष्ठ कौन-सी पद्धति दिखा रहा है, सत्ताईस की या अठाईस की? ऊपर बताए अनुसार दोनों अलग जगत हैं। इन तीनों के बाद ही चौथा, ज्योतिषीय सवाल आता है: शुभ-अशुभ पट्टी; और वहां भी याद रखिए कि मुहूर्त-पद्धति में योग अकेला कारक नहीं, तिथि, वार, नक्षत्र और करण के साथ का एक कारक है, और उस पट्टी की प्रकृति परंपरा-निर्धारित है, गणित-निर्धारित नहीं।
सार में योग पंचांग का सबसे खुलकर कृत्रिम अंग है, और उसी में उसकी शिक्षा है: एक ऐसी गिनती-इकाई जो किसी खगोलीय वस्तु को नहीं दिखाती, जो पंचांग में बाकी अंगों से सदियों बाद आई, और जिसका मूल्य उस पद्धति के भीतर है जो उसे प्रयोग करती है। गणना सीखिए, समाप्ति-समय पढ़िए, पद्धति पहचानिए; बाकी फैसले परंपरा और आपके स्वयं के मूल्यांकन के हैं।