तिथि क्या है: 12 अंश का कोण, सूर्योदय-नियम, क्षय-वृद्धि और दो पंचांगों के अलग जवाब
तिथि एक कोण है, दिन की गिनती नहीं: सूर्य से चंद्रमा की दूरी का बारहवां पड़ाव; सूर्योदय-नियम, क्षय और वृद्धि की विसंगतियां, अयनांश से मुक्ति, और दो पंचांगों के असली मतभेद।
पंचांग के पांच अंगों में तिथि वह है जिसे आम भाषा में "तारीख" समझ लिया जाता है; लेकिन उसकी सटीक परिभाषा दिन की गिनती नहीं, एक कोण है। shastrapanchangam की विधि-पृष्ठ की पहली पंक्ति: तिथि एक चांदनी दिन है, और यह तब बदलती है जब सूर्य के सापेक्ष चंद्रमा का देशांतर 12 अंश बढ़ जाता है। यानी तिथि घड़ी की इकाई से पहले ज्यामिति की इकाई है: आकाश में सूर्य और चंद्रमा के बीच बढ़ता कोण। इस लेख में हम उसी क्रम से चलते हैं: इकाई क्या है, उसकी लंबाई क्यों बदलती है, किसी दिन की तिथि कैसे तय होती है, क्षय और वृद्धि की दो विसंगतियां क्या हैं, तीसों नाम क्या हैं, दो मास-पद्धतियों में गिनती कैसे बदलती है, और दो पंचांगों के जवाब अलग क्यों आते हैं।
इकाई: 12 अंश का कोण
गणना का तरीका shastrapanchangam के शब्दों में: राशि-चक्र पर चंद्रमा और सूर्य के देशांतर अंशों में लीजिए, चंद्रमा के देशांतर से सूर्य का देशांतर घटाइए, और परिणाम को 0 से 360 अंश के बीच पढ़िए; हर 12 अंश का अंतराल एक तिथि है, और तीस तिथियों का एक चांद्र-मास बनता है। शून्य पर दोनों एक ही दिशा में होते हैं, अमावस्या का क्षण; 180 अंश पर आमने-सामने, पूर्णिमा। शून्य से 180 तक का सफर शुक्ल पक्ष है, चंद्रमा बढ़ता हुआ; 180 से 360 तक कृष्ण पक्ष, चंद्रमा घटता हुआ। यही कारण है कि तिथि को कभी "चांदनी तारीख" कहा जाता है: यह दरअसल चंद्रमा की सूर्य से दूरी का पंद्रहवां हिस्सा-दर-हिस्सा माप है, धरती के घूमने का नहीं। विकिपीडिया की परिभाषा भी यही है: सूर्य और चंद्रमा के देशांतर-कोण के 12 अंश बढ़ने में लगा समय।
लंबाई क्यों बदलती है
यदि चंद्रमा और सूर्य समान गति से चलते, तो हर तिथि ठीक उतने ही घंटों की होती। लेकिन विकिपीडिया दोनों के दीर्घवृत्ताकार कक्षाओं और चंद्रमा की असमान गति का हवाला देती है, और आंकड़े भी देती है: औसत तिथि लगभग 23 घंटे 37 मिनट, पर असली अवधि लगभग 19 घंटे 59 मिनट से 26 घंटे 47 मिनट तक बदलती है। शास्त्रीय ग्रंथों में यही असमानता सूर्यसिद्धांत जैसे ग्रंथों की गति-गणना का विषय है, और आधुनिक खगोल-विज्ञान उसी की पुष्टि करता है, यह उस पृष्ठ का हवाला है। इसका व्यावहारिक परिणाम: तिथि दिन के किसी भी घंटे शुरू या खत्म हो सकती है, सुबह 6 बजे ज़रूरी नहीं। इसीलिए shastrapanchangam लिखता है कि पंचांग-पृष्ठों पर तिथि के नाम के साथ उसके समाप्त होने का समय छपता है; समाप्ति-समय ही असली सूचना है, नाम के साथ लगी तारीख नहीं।
आज की तिथि कौन-सी: सूर्योदय-नियम
यहां एक सूक्ष्म परंतु केंद्रीय बात है। तिथि का बदलना एक खगोलीय क्षण है: shastrapanchangam के अनुसार भूकेंद्रीय गणना में वह क्षण पूरी पृथ्वी के लिए एक ही होता है, दिल्ली और ईरान के लिए अलग नहीं। लेकिन "आज की तिथि क्या है" का जवाब स्थान पर निर्भर है, क्योंकि दैनिक पंचांग-पृष्ठ स्थानीय सूर्योदय पर चल रही तिथि दिखाते हैं। दो शहरों में सूर्योदय अलग समय पर होता है; panchangya अपनी विधि-पृष्ठ पर लिखता है कि भारत भर में सूर्योदय में लगभग एक घंटे का अंतर है, इसलिए हर समय-खिड़की वहां आपके शहर के सूर्योदय से गिनी जाती है। तो तिथि-सूची पढ़ते समय दो चीजें देखें: तिथि का नाम और उसका समाप्ति-समय; यदि तिथि अगले सूर्योदय से पहले खत्म हो रही है, तो दिन के बाकी हिस्से में अगली तिथि चलेगी। व्रत और पर्व इसी "किस घड़ी पर कौन-सी तिथि" से बंधते हैं; हमारे व्रत-लेख में एकादशी और प्रदोष की घड़ियां इसी नियम पर खुलती हैं।
दो विसंगतियां: क्षय और वृद्धि
चूंकि तिथि 19 से 27 घंटे की कहीं भी हो सकती है और सूर्योदय हर 24 घंटे आता है, दो उलटी विसंगतियां स्वाभाविक हैं। पहली: कोई तिथि एक सूर्योदय के बाद शुरू हो और अगले सूर्योदय से पहले खत्म हो जाए; तब वह किसी भी दिन की "सूर्योदय-तिथि" नहीं बनती। इसे क्षय तिथि कहते हैं, दोनों स्रोतों में यह नाम है। panchangya अपनी पारदर्शिता-नोट में जोड़ता है: क्षय तिथि को भी दिखाया जाता है, चुपचाप सूची से हटाया नहीं जाता। दूसरी विसंगति उलटी है: कोई लंबी तिथि दो लगातार सूर्योदयों पर मौजूद रहे। यहां स्रोतों के नाम अलग हैं, और हम विसंगति यथावत दर्ज करते हैं: panchangya इसे वृद्धि कहता है, जबकि विकिपीडिया उसी घटना के लिए अधिक या अहोरात्र तिथि शब्द देती है। दोनों हमने खोले; दोनों नामों का प्रयोग जारी है, और इस लेख में हम panchangya के नामकरण के साथ विकिपीडिया के पर्याय को कोष्ठक में रखते हैं। panchangya की पद्धति-टिप्पणी सुव्यवस्थित है: दोनों स्थितियों के लिए अलग नियम नहीं चाहिए; हर तिथि की असली शुरुआत और अंत निकालकर देख लीजिए कि सूर्योदय पर कौन-सी चल रही है, दोनों परिणाम अपने आप निकलते हैं।
तीस नाम
तीस तिथियों के नाम विकिपीडिया की तालिका से, दोनों पक्षों में गिनती एक ही क्रम रखती है; अंत केवल पंद्रहवीं का है। प्रतिपदा (पहली), द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी; और पंद्रहवीं शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा, कृष्ण पक्ष में अमावस्या। यानी "द्वितीया" अकेले अधूरी सूचना है; पूरा नाम पक्ष के साथ बनता है, शुक्ल द्वितीया या कृष्ण द्वितीया। पंचांग-पृष्ठों और व्रत-सूचियों में यही पूरा रूप चलता है: शुक्ल एकादशी, कृष्ण अष्टमी। इनमें कुछ नाम व्रत-पर्व कैलेंडर में अलग महत्व रखते हैं: हर पक्ष की एकादशी व्रत-तिथि है, कृष्ण चतुर्थी संकष्टी से जुड़ी है, शुक्ल चतुर्थी विनायक-व्रत से, पूर्णिमा और अमावस्या अपने-अपने मासिक अनुष्ठानों के केंद्र हैं; कौन-सा व्रत किस तिथि से बंधा है, यह हमारे व्रत-विधि वाले लेख और त्योहार-क्लस्टर में खुलता है।
तिथि बनाम नागरिक तारीख
दो कैलेंडर अलग रखना इस लेख का आधा सार है। नागरिक तारीख धरती के घूमने से बनती है: मध्यरात्रि से मध्यरात्रि, हर जगह लगभग 24 घंटे, कभी 19 कभी 27 नहीं। तिथि चंद्रमा-सूर्य के कोण से बनती है: वह मध्यरात्रि की परवाह नहीं करती, किसी भी घंटे शुरू होकर किसी भी घंटे खत्म हो सकती है, और उसकी लंबाई हर बार थोड़ी अलग है। इसीलिए एक ही नागरिक दिन में दो तिथियां आ सकती हैं, और एक ही तिथि तीन नागरिक तारीखों को छू सकती है, भले सूर्योदय-नियम से उसका नाम एक ही दिन से जुड़े। विकिपीडिया टिप्पणी करती है कि नेपाल भाषा में तिथि को मिलाल्या कहते हैं; यह नाम भी "दिन" नहीं, चंद्र-दोषा की अवधि का है। व्यवहार में इस भेद का सबसे आम प्रयोग: जन्मदिन। जो परिवार जन्म-तिथि मनाते हैं, वे हर साल पंचांग से वह तिथि खोजते हैं जिसमें जन्म हुआ था; वह ग्रेगोरी जन्मतारीख से अक्सर कुछ दिन इधर-उधर पड़ती है, क्योंकि दो कैलेंडर की घड़ियां अलग चलती हैं। इसी कारण श्राद्ध और बरसी भी तिथि से चलते हैं, नागरिक तारीख से नहीं।
पांच अंगों में तिथि का स्थान
विकिपीडिया के अनुसार पंचांग के पांच अंग हैं: तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। इनमें तिथि और वार सबसे अधिक उद्धृत होते हैं, और दोनों की प्रकृति एक-दूसरे के विपरीत है: वार सात-दिन का निश्चित चक्र है, ग्रहण-गणना से मुक्त; तिथि शुद्ध खगोल-माप है, जो हर माह अपनी लंबाई बदलती है। मुहूर्त-चुनाव में दोनों मिलकर काम करते हैं: विकिपीडिया लिखती है कि तिथि और नक्षत्र मिलकर दैनिक और विशेष कार्यों के लिए मुहूर्त चुनने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं, और कुछ तिथियों को कुछ कार्यों के लिए अधिक अनुकूल माना जाता है; यह उसकी सामान्य प्रस्तुति है, जिसका विस्तार इस क्लस्टर के how-to-choose-muhurat लेख में होगा। इस क्लस्टर के अगले लेख भी इन्हीं अंगों को एक-एक करके खोलेंगे: वार, योग, करण, और फिर समय-खंडों की परतें, राहु काल, चौघड़िया, होरा।
गिनती कहां से: अमान्त और पूर्णिमान्त
एक ही तिथि-क्रम दो मास-पद्धतियों में अलग जगह से शुरू होता है। विकिपीडिया के अनुसार अमान्त चांद्र-कैलेंडर में गिनती शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होती है, यानी मास की शुरुआत अमावस्या के अगले दिन से; पूर्णिमान्त में कृष्ण प्रतिपदा से, यानी पूर्णिमा के अगले दिन से। इसका परिणाम यह है कि कुछ महीनों में एक ही तिथि दो पद्धतियों में अलग-अलग मास-नामों से जुड़ती है। यह भेद इस क्लस्टर के आगामी लेख amanta-vs-purnimanta का विषय है; यहां बस इतना दर्ज करना काफी है कि तिथि-नाम अपने साथ पक्ष और मास-पद्धति का संदर्भ मांगता है, अकेला नाम कभी-कभी दो पढ़ावों पर अलग महीने दिखा सकता है।
एक दुर्लभ स्थिरता: अयनांश का प्रभाव नहीं
पंचांग-गणना का सबसे विवादित निर्णय अयनांश का चुनाव है; panchangya लिखता है कि दो पंचांग सिर्फ इसलिए अलग पर्व-तिथियां दे सकते हैं कि उनका अयनांश अलग है। लेकिन तिथि उस विवाद से बाहर है। कारण दोनों स्रोत एक ही देते हैं: अयनांश दोनों देशांतरों, सूर्य और चंद्रमा, में समान रूप से जुड़ता है, और तिथि उनके अंतर से बनती है; अंतर निकालते समय समान मात्रा कट जाती है। shastrapanchangam के शब्दों में: दोनों देशांतरों से समान अयनांश घटाने पर उनका अंतर अपरिवर्तित रहता है, इसलिए अयनांश तिथि नहीं बदलता। panchangya इसे पंचांग की उन चंद चीजों में गिनता है जिन्हें निर्देशांक-पद्धति का चुनाव बदल ही नहीं सकता। यानी यदि दो पंचांगों की तिथियां अलग हैं, तो कारण अयनांश नहीं, कहीं और खोजना होगा।
तो दो पंचांग अलग क्यों बोलते हैं
असली कारणों की सूची हमारे स्रोतों में तीन प्रमुख हैं। पहला, गणना-पद्धति: विकिपीडिया के अनुसार पारंपरिक पंचांग अक्सर सूर्यसिद्धांत और बाद के सिद्धांत-ग्रंथों की माध्य गतियों से तिथि-सीमाएं निकालते हैं, जबकि आधुनिक पंचांग उच्च-परिशुद्धता तालिकाओं, जैसे NASA JPL DE शृंखला, से सही देशांतर लेते हैं; दोनों के जवाबों में कुछ मिनट, दुर्लभ स्थितियों में लगभग एक घंटे तक का अंतर आ सकता है। दूसरा, दृक् और वाक्य: shastrapanchangam लिखता है कि वाक्य तालिकाओं पर चलने वाले पंचांग तिथि-समाप्ति दृक् पंचांगों से देर से छापते हैं, अक्सर आधे घंटे या अधिक; यह उसकी अपनी तुलना है। तीसरा, तालिका-स्रोत की पारदर्शिता: panchangya अपनी विधि खोलकर बताता है, astronomy-engine नामक खुला तंत्र जो VSOP87 ग्रह-सिद्धांत पर आधारित है, और हर मान उसी क्षण की गणना से निकलता है, किसी छपी तालिका से नकल नहीं। यह आधुनिक पढ़ाव का नमूना है: जो पंचांग अपनी विधि न बताए, उसके अंतर का कारण पाठक नहीं जान सकता। परामर्शित स्रोतों के दायरे में इतना ही कहा जा सकता है: अंतर अयनांश से नहीं, गणना-पद्धति और तालिका-परंपरा से आता है।
एक कार्यित उदाहरण
मान लीजिए किसी शहर के पंचांग-पृष्ठ पर लिखा है: कृष्ण त्रयोदशी, समाप्ति दोपहर 1:12। इसका पढ़ने का ढंग: सूर्योदय पर त्रयोदशी चल रही थी, इसलिए दिन का नाम त्रयोदशी है; 1:12 पर त्रयोदशी समाप्त होकर चतुर्दशी शुरू होगी, और शाम की पूजा चतुर्दशी में होगी। यदि प्रदोष-व्रत की बात हो, जो त्रयोदशी-सायंकाल से बंधा है, तो यही समाप्ति-समय तय करता है कि व्रत किस दिन रखा जाएगा; यही कारण है कि व्रत-तिथियां साल-दर-साल शहर-दर-शहर पंचांग से जांची जाती हैं। दूसरा उदाहरण: किसी माह कोई तिथि, मान लीजिए शुक्ल षष्ठी, एक सूर्योदय के बाद शुरू होकर अगले से पहले खत्म हो जाए, तो कैलेंडर-पंक्तियों में वह नाम गायब दिखेगा; गायब होना गलती नहीं, क्षय है, और panchangya जैसी पद्धति उसे सूची में दिखाकर ही सही मानती है। तीसरा उदाहरण: लंबी एकादशी दो सूर्योदयों पर रहे, तो दोनों दिन एकादशी लिखी मिलेगी; कौन-से दिन व्रत, यह संप्रदाय-नियम तय करते हैं, जो इस लेख के दायरे से बाहर है।
तीन सवाल, किसी भी तिथि-सूची के लिए
पहला, गणना किस परंपरा की है: दृक् या वाक्य, माध्य गति या सही देशांतर? shastrapanchangam की तुलना के अनुसार वाक्य-पंचांग समाप्ति-समय अक्सर आधे घंटे या अधिक देर से छापते हैं; सूची-पृष्ठ अपनी विधि बताए तो पढ़ें। दूसरा, सूर्योदय किस शहर का है: तिथि का बदलना पूरी पृथ्वी पर एक क्षण है, पर "आज की तिथि" स्थानीय सूर्योदय से तय होती है, और भारत में सूर्योदय का अंतर लगभग एक घंटा है; दूसरे शहर की सूची अपने शहर पर न तोलें। तीसरा, इस माह कोई तिथि क्षय या वृद्धि (अधिक/अहोरात्र) तो नहीं: यदि कैलेंडर में कोई तिथि-नाम गायब या दोबारा है, तो पहले यह जांचें कि पंचांग ने उसे दर्ज किया है या छोड़ दिया है; ईमानदार सूची दोनों स्थितियां दिखाती है।
स्रोत-टिप्पणी: इस लेख के तीन स्रोत, तीनों पूरे खोले गए। shastrapanchangam (shastrapanchangam.com/en/method/tithi/): तिथि की परिभाषा और घटाकर-गणना, चंद्रमा की असमान गति से अवधि-भिन्नता, समाप्ति-समय छपने का कारण, सूर्योदय-नियम, क्षय तिथि की परिभाषा, भूकेंद्रीय क्षण की सर्वत्र-एकता, अयनांश-निरपेक्षता, और वाक्य-बनाम-दृक् तुलना (वाक्य समाप्ति अक्सर आधे घंटे या अधिक देर से)। विकिपीडिया का Tithi पृष्ठ: 12 अंश की परिभाषा, औसत 23 घंटे 37 मिनट और सीमा 19 घंटे 59 मिनट से 26 घंटे 47 मिनट, सूर्यसिद्धांत माध्य-गति बनाम आधुनिक सही-देशांतर पद्धतियों और उनका अंतर (कुछ मिनट, दुर्लभ में एक घंटा), क्षय तिथि और अधिक/अहोरात्र तिथि की परिभाषाएं, तीस नामों की तालिका, अमान्त और पूर्णिमान्त की गिनती-शुरुआत, पंचांग के पांच अंगों में तिथि का स्थान। panchangya (panchangya.com/en/methodology): तिथि = 12 अंश की दीर्घा-दूरी, अयनांश का अंतर में पूर्ण निरसन, क्षय/वृद्धि नामकरण (वृद्धि नाम उसी का है; विकिपीडिया के अधिक/अहोरात्र से विसंगति दर्ज), क्षय तिथि को दिखाने का सिद्धांत, शहर-वार सूर्योदय (भारत में लगभग एक घंटे का अंतर), astronomy-engine/VSOP87 तालिका-स्रोत और Lahiri अयनांश विवरण। पुनरावृत्त तिथि का नामकरण दो स्रोतों में अलग है (वृद्धि बनाम अधिक/अहोरात्र); विसंगति यथावत दर्ज है, हम किसी नामकरण को प्रमाणित नहीं करते। सूर्यसिद्धांत हमने स्वयं नहीं खोला; उसका प्रसंग विकिपीडिया के हवाले से अप्रत्यक्ष उद्धरण है।